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रुम्मिनदेई (रुमिनदेई) स्तंभ अभिलेख में स्पष्ट है कि बुद्ध का जन्म लुंबिनी में हुआ था और वहाँ अशोक ने कर कम कर दिए थे।
सारनाथ में ही बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश दिया था।
उरुवेला में ही बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
राजगृह बुद्ध के प्रचार का प्रमुख केंद्र था और यहाँ उन्होंने अनेक उपदेश दिए, बाद में यहीं प्रथम संगीति हुई थी।
सांची के स्तूप का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने करवाया था।
सही मिलान (c) है: सुत्त पिटक-बुद्ध के उपदेश (2), विनय पिटक-संघ संहिता (3), अभिधम्म पिटक-दार्शनिक विवेचन (1)।
सुत्त पिटक में भगवान बुद्ध के उपदेशों और उनके विभिन्न संवादों का संग्रह है।
विनय पिटक में संघ में रहने वाले भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए आचार-संहिता और अनुशासन के नियम दिए गए हैं।
अभिधम्म पिटक बौद्ध धर्म के दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की गहन व्याख्या करता है।
त्रिपिटक बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन पवित्र ग्रंथ हैं।
बुद्ध के जीवन का संबंध मुख्य रूप से कोसल और मगध राज्यों से था, जहाँ उन्होंने अपने धर्म का सर्वाधिक प्रचार किया।
बुद्ध के समय मगध का शासक बिम्बिसार था, जो उनका अनुयायी भी बना था।
बुद्ध के जीवन काल में कोसल का राजा प्रसेनजित था।
बुद्ध के जीवन और प्रचार का क्षेत्र मुख्य रूप से गंगा घाटी के मध्यवर्ती राज्य थे, अवंति और गांधार इसमें शामिल नहीं थे।
गौतम बुद्ध ने अपने जीवन के अंतिम समय में कुशीनगर में 'सुभद्र' को दीक्षित किया था।
बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था, जिसे 'धर्मचक्रप्रवर्तन' कहा गया।
बुद्ध ने कुशीनगर में अपना शरीर त्याग दिया था, जिसे महापरिनिर्वाण कहा जाता है।
आनंद बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य और व्यक्तिगत सेवक थे।
क्योटो प्रोटोकॉल का लक्ष्य वैश्विक तापमान को कम करने हेतु ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करना था।