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बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र के अंतर्गत लॉरेन्स कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg) के 'नैतिक विकास के सिद्धांत' (Theory of Moral Development) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को मुख्य रूप से तीन स्तरों (Levels) और प्रत्येक स्तर में दो-दो अवस्थाओं (Stages) यानी कुल छह अवस्थाओं में विभाजित किया है, जिसका अध्ययन करने के लिए उन्होंने 'डिलेमा' (Dilemma - दुविधा) कहानियों, विशेष रूप से 'हाइन्ज डिलेमा' (Heinz Dilemma) का उपयोग किया था। 2. 'पूर्व-पारंपरिक नैतिकता स्तर' (Pre-conventional Level - लगभग 4 से 10 वर्ष) की दूसरी अवस्था 'सापेक्षिक सुखवादी अभिविन्यास' (Instrumental Relativist Orientation) से संबंधित है, जिसमें बालक दूसरों की भलाई के लिए नहीं बल्कि केवल अपने स्वार्थ, व्यक्तिगत लाभ या 'जैसे को तैसा' (Tit for Tat) के आदान-प्रदान के नियम के आधार पर निर्णय लेता है। 3. 'उत्तर-पारंपरिक नैतिकता स्तर' (Post-conventional Level) की अंतिम अवस्था (छठी अवस्था) 'सार्वभौमिक नैतिक विवेक अभिविन्यास' (Universal Ethical Principle Orientation) कहलाती है, जिसमें व्यक्ति बाहरी नियमों या कानूनों की परवाह किए बिना अपने अंतःकरण, मानवाधिकारों और न्याय के सार्वभौमिक सिद्धांतों के आधार पर सही या गलत का निर्णय लेता है, भले ही वे कानून के विरुद्ध क्यों न हों। उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

लॉरेन्स कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत बाल विकास मनोविज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और वैचारिक टॉपिक है। दिए गए तीनों कथन पूर्ण रूप से सत्य हैं: 1) कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के 3 स्तर और 6 अवस्थाएँ बताईं तथा अपने शोध के लिए प्रसिद्ध 'हाइन्ज डिलेमा' (Heinz Dilemma) का प्रयोग किया था। 2) पूर्व-पारंपरिक स्तर के अंतर्गत दूसरी अवस्था 'सापेक्षिक सुखवादी या साधन-उद्देश्य अभिविन्यास' (Instrumental Purpose Orientation) होती है, जहाँ बच्चा 'यदि तुम मेरी पीठ खुजाओगे, तो मैं तुम्हारी खुजाऊँगा' (Tit for Tat) की भावना से प्रेरित होता है। 3) उत्तर-पारंपरिक स्तर की छठी और अंतिम अवस्था 'सार्वभौमिक नैतिक विवेक अभिविन्यास' है, जिसमें व्यक्ति समाज के बनाए कानूनों से ऊपर उठकर अपने व्यक्तिगत आंतरिक विवेक और न्याय के सार्वभौमिक सिद्धांतों (जैसे अहिंसा, मानवाधिकार) को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।
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