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प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और दर्शन के संदर्भ में, न्याय दर्शन और उसके प्रणेता महर्षि गौतम द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. न्याय दर्शन एक यथार्थवादी (Realistic) और विश्लेषणात्मक दर्शन है, जिसके प्रवर्तक महर्षि गौतम (अक्षपाद) हैं, और इसका मुख्य उद्देश्य तर्क और प्रमाण के माध्यम से 'मोक्ष' (दुखों की आत्यंतिक निवृत्ति) प्राप्त करना है।
  2. 2. इस दर्शन में ज्ञान प्राप्ति के लिए चार प्रमाण स्वीकार किए गए हैं: प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द (आप्तोपदेश)।
  3. 3. न्याय दर्शन के अनुसार, ईश्वर संसार का रचयिता नहीं है बल्कि वह केवल इस ब्रह्मांड का एक निमित्त कारण (Efficient Cause) है, जो पूर्व-निर्मित परमाणुओं से सृष्टि का संचालन करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

न्याय दर्शन भारतीय खड़दर्शन (षड्दर्शन) में से एक प्रमुख आस्तिक दर्शन है। इसके प्रवर्तक महर्षि गौतम (जिन्हें अक्षपाद भी कहा जाता है) हैं। कथन 1 सही है क्योंकि न्याय दर्शन पूरी तरह से तार्किक, विश्लेषणात्मक और यथार्थवादी दृष्टिकोण रखता है जिसका अंतिम लक्ष्य दुखों से मुक्ति पाना है। कथन 2 भी सही है क्योंकि न्याय दर्शन में वैध ज्ञान (प्रमा) प्राप्त करने के लिए चार प्रमाणों- प्रत्यक्ष (Perception), अनुमान (Inference), उपमान (Comparison), और शब्द (Testimony)- को मान्यता दी गई है। कथन 3 भी सही है; न्याय दर्शन के अनुसार ईश्वर इस संसार का उपादान (Material) कारण नहीं बल्कि निमित्त (Efficient) कारण है, अर्थात वह प्रकृति के नित्य परमाणुओं से इस सृष्टि की रचना और संचालन करता है। अतः तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं।
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