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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'संविधान की प्रस्तावना' (Preamble) तथा उसकी विधिक स्थिति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान की प्रस्तावना पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत और संविधान सभा द्वारा 22 जनवरी 1947 को अंगीकृत किए गए 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) पर आधारित है, और इसे संविधान के किसी भी अन्य भाग की तरह अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधित किया जा सकता है, बशर्ते यह उसकी मूल संरचना (Basic Structure) को क्षति न पहुँचाए।
- 2. 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया था कि प्रस्तावना भारतीय संविधान का एक अभिन्न हिस्सा (Integral Part) है और न्यायपालिका इसके प्रावधानों के आधार पर किसी भी कानून की वैधता का निर्धारण कर सकती है।
- 3. 'केशवानंद भारती वाद (1973)' तथा 'एलआईसी ऑफ इंडिया वाद (1995)' में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णयों को बदलते हुए यह प्रतिपादित किया कि प्रस्तावना संविधान का एक आंतरिक भाग है, किंतु यह गैर-न्यायिक (Non-justiciable) प्रकृति की है, अर्थात् इसके प्रावधानों को अदालतों द्वारा सीधे प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान की प्रस्तावना पंडित जवाहरलाल नेहरू के 'उद्देश्य प्रस्ताव' पर आधारित है। केशवानंद भारती वाद (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है और अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते यह संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का उल्लंघन न करे (42वें संशोधन द्वारा इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े भी गए थे)।
कथन 2 गलत है: 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा था कि **प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है**। हालांकि, बाद में 'केशवानंद भारती वाद (1973)' और 'एलआईसी ऑफ इंडिया वाद (1995)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है।
कथन 3 सही है: केशवानंद भारती और एलआईसी ऑफ इंडिया मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि प्रस्तावना संविधान का भाग है, लेकिन यह गैर-न्यायिक (Non-justiciable) है, यानी इसके प्रावधानों को देश के किसी भी न्यायालय में कानूनी रूप से लागू या प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है और न ही यह विधायिका की शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है।
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'एल नीनो-दक्षिणी दोलन' (ENSO - El Nino-Southern Oscillation) और भारतीय मानसून पर इसके प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. एल नीनो के दौरान, उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के पूर्वी और मध्य भाग में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जिससे पेरू और इक्वाडोर के तटों पर ठंडे पानी के अपवेलिंग (Upwelling) की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है और प्लवक (Plankton) की मात्रा में भारी वृद्धि होती है।
2. 'दक्षिणी दोलन सूचकांक' (Southern Oscillation Index - SOI) का ऋणात्मक मान ताहिती (प्रशांत महासागर) और डार्विन (हिन्द महासागर/ऑस्ट्रेलिया) के बीच वायु दाब के असामान्य अंतर को दर्शाता है, जो आमतौर पर भारत में कमजोर मानसून और कम वर्षा से जुड़ा होता है।
3. 'इंडियन ओपेन डिपोल' (IOD - Indian Ocean Dipole) को कभी-कभी 'भारतीय मानसून का मिनी-एल नीनो' कहा जाता है, जहाँ सकारात्मक IOD चरण भूमध्यरेखीय हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में गर्म तापमान के कारण एल नीनो के प्रतिकूल प्रभावों को आंशिक रूप से संतुलित या कमजोर कर सकता है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत 'जीवन का अधिकार' और 'निजीता का अधिकार' (Right to Privacy) के ऐतिहासिक न्यायिक निर्णयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उच्चतम न्यायालय ने 'के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' के ऐतिहासिक नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सर्वसम्मति वाले निर्णय में यह स्पष्ट किया कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न अंग है, और यह एक मौलिक अधिकार है।
2. 'पुट्टस्वामी निर्णय' से पहले, सर्वोच्च न्यायालय ने 'एम.पी. शर्मा बनाम सतीश चंद्र (1954)' तथा 'खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1962)' मामलों में यह निर्णय दिया था कि भारतीय संविधान में निजता के अधिकार का कोई विशिष्ट या अंतर्निहित प्रावधान नहीं है, जिसे बाद के निर्णयों द्वारा उलट दिया गया।
3. निजता का अधिकार एक निरपेक्ष (Absolute) मौलिक अधिकार है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, लोक व्यवस्था या किसी अपराध के निवारण के नाम पर भी संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा इस अधिकार पर कोई विधายकीय प्रतिबंध या युक्तिसंगत निर्बंधन (Reasonable Restrictions) नहीं लगाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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