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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय के आरंभिक अधिकारक्षेत्र' (Original Jurisdiction - Article 131) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत उच्चतम न्यायालय का आरंभिक अधिकारक्षेत्र भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच, या भारत सरकार और किसी राज्य तथा राज्यों के बीच के किसी भी कानूनी विवाद में सुनवाई करने की अनन्य (Exclusive) शक्ति प्रदान करता है, बशर्ते कि यह विवाद किसी राजनीतिक प्रकृति की संधि या समझौते से उत्पन्न न हुआ हो।
- 2. 'राज्य' शब्द की परिभाषा के अंतर्गत अनुच्छेद 131 के प्रयोजनों के लिए केवल भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर आने वाली राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, और इसमें कोई भी सांविधिक निकाय, सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (PSU) या सरकार के स्वामित्व वाला निगम शामिल नहीं है।
- 3. 'कर्नाटक राज्य बनाम भारत संघ (1978)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि अनुच्छेद 131 के अंतर्गत एक राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार के किसी विधायी अधिनियम या कार्यकारी आदेश की संवैधानिकता को चुनौती देने वाला वाद पूरी तरह से विचारणीय (Maintainable) है, भले ही वह विवाद संघीय संतुलन से सीधे जुड़ा न हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 131 के अनुसार, उच्चतम न्यायालय को केंद्र और राज्यों के बीच या राज्यों के आपसी कानूनी विवादों में आरंभिक और अनन्य अधिकारक्षेत्र प्राप्त है। इसका अर्थ यह है कि ऐसे मामलों की सुनवाई सीधे उच्चतम न्यायालय में ही हो सकती है, किसी अन्य अदालत में नहीं। इसके अपवादों में संविधान लागू होने से पहले की संधियाँ और समझौते शामिल हैं। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 131 के तहत 'राज्य' की परिभाषा में केवल राज्य सरकारें शामिल हैं। इसमें केंद्र शासित प्रदेश (UTs) शामिल नहीं हैं, क्योंकि उनके अधिकार क्षेत्र के विवाद सीधे इस अनुच्छेद के अंतर्गत नहीं आते। इसके अलावा, उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के अनुसार, कोई निजी पक्ष, सांविधिक निकाय या सार्वजनिक उपक्रम (PSU) इस अनुच्छेद के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं आ सकता, क्योंकि यह प्रावधान केवल संघीय इकाइयों (केंद्र और राज्यों) के बीच के विवादों के लिए है। कथन 3 गलत है: 'कर्नाटक राज्य बनाम भारत संघ (1978)' तथा बाद के अन्य मामलों (जैसे छत्तीसगढ़ राज्य बनाम भारत संघ, 2020) में न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 131 के अंतर्गत वाद तभी विचारणीय होगा जब उसमें किसी 'कानूनी अधिकार' (Legal Right) के उल्लंघन का प्रश्न निहित हो। यदि कोई राज्य केवल केंद्र सरकार के किसी अधिनियम या नीति की संवैधानिकता को सामान्य रूप से चुनौती देना चाहता है (जो संघीय अधिकारों के उल्लंघन से सीधे संबंधित नहीं है), तो अनुच्छेद 131 का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
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अनुच्छेद 21-A के कार्यान्वयन के लिए कौन सा अधिनियम पारित किया गया था?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) के अंतर्गत समाविष्ट 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति (1976) की सिफारिशों के आधार पर '42वें संविधान संशोधन अधिनियम' के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था, तथा मूल रूप से संविधान में 10 मूल कर्तव्य शामिल किए गए थे, जबकि 11वां मूल कर्तव्य '86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002' द्वारा जोड़ा गया।
2. संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत ये सभी कर्तव्य केवल भारत के नागरिकों पर ही लागू होते हैं, और इनमें से कुछ कर्तव्य प्रकृति में नैतिक (Moral) हैं जबकि कुछ कर्तव्य नागरिक (Civic) प्रकृति के हैं।
3. यद्यपि मूल कर्तव्य स्वंय में न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इनके उल्लंघन पर सीधे न्यायालय द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता है, किंतु संसद को यह सांविधिक शक्ति प्राप्त है कि वह विधि बनाकर इनमें से किसी भी कर्तव्य के प्रवर्तन के लिए उचित दंड या शास्ति (Penalty) का उपबंध कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, 'सामूहिक उत्तरदायित्व' (Collective Responsibility) तथा 'विश्वास मत' (Vote of Confidence) की लोकतांत्रिक पद्धतियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, जिसका विधिक एवं संवैधानिक अर्थ यह है कि मंत्रिमंडल का प्रत्येक निर्णय पूरी मंत्रिपरिषद का निर्णय माना जाता है और यदि लोकसभा में सरकार के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है या कोई महत्वपूर्ण सरकारी विधेयक गिर जाता है, तो संपूर्ण सरकार को त्यागपत्र देना पड़ता है।
2. 'विश्वास मत' (Vote of Confidence) की अवधारणा का स्पष्ट उल्लेख मूल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 या किसी अन्य अनुच्छेद में नहीं किया गया है, बल्कि यह संसदीय लोकतंत्र और दलबदल विरोधी कानूनों की पृष्ठभूमि में विकसित एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से गठबंधन सरकारों या अल्पमत सरकारों को सदन में अपना बहुमत साबित करने का अवसर दिया जाता है।
3. 'एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि किसी भी राज्य में सरकार के बहुमत का परीक्षण राज्यपाल के राजभवन में उसकी वैयक्तिक संतुष्टि के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसके लिए एकमात्र संवैधानिक और अनिवार्य मंच राज्य की विधानसभा ही है, जहाँ फ्लोर टेस्ट (Floor Test) के माध्यम से बहुमत का निर्धारण किया जाना चाहिए।
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) और पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment - EIA) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी, और यह भारत का एकमात्र ऐसा वैधानिक निकाय है जिसे दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत निर्धारित सिविल न्यायालयों की सामान्य प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया गया है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होता है।
2. पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के तहत 'श्रेणी A' की परियोजनाओं के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से पर्यावरणीय पूर्व-स्वीकृति (Prior Environmental Clearance) प्राप्त करना अनिवार्य होता है, जबकि 'श्रेणी B' की परियोजनाओं के मूल्यांकन और स्वीकृति का अधिकार संबंधित राज्य की पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) को दिया गया है, और इसके लिए किसी भी परिस्थिति में केंद्र सरकार की संस्तुति की आवश्यकता नहीं होती है।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, NGT के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध सीधे भारत के सर्वोच्च न्यायालय में नब्बे दिनों की अवधि के भीतर अपील दायर की जा सकती है, और अधिकरण के पास पर्यावरण से जुड़े मामलों में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की वैधानिक शक्ति भी प्राप्त है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' (पंचायती राज - अनुच्छेद 243 से 243O) तथा 'भाग IXक' (नगरपालिकाएँ - अनुच्छेद 243P से 243ZG) के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 243-I के अनुसार प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, पंचायत की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के लिए प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर एक 'राज्य वित्त आयोग' का गठन करेगा, जो राज्यपाल को यह संस्तुति करेगा कि राज्य द्वारा एकत्र किए जाने वाले करों और शुल्कों का पंचायतों और नगरपालिकाओं के बीच किस प्रकार वितरण किया जाना चाहिए।
2. संविधान के अनुच्छेद 243-G के अंतर्गत पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ तैयार करने तथा ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध 29 विषयों के संबंध में कार्यक्रम लागू करने की जिम्मेदारी सौंपने के लिए राज्य के विधानमंडल को विधि द्वारा शक्ति प्रदान की गई है, और यह शक्ति राज्य के लिए पूरी तरह से अनिवार्य (Mandatory) है, स्वैच्छिक नहीं।
3. संविधान के अनुच्छेद 243-ZA के अनुसार प्रत्येक नगरपालिका के लिए निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की समस्त शक्ति 'भारत निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) में निहित होती है, न कि राज्य निर्वाचन आयोग में, क्योंकि शहरी स्थानीय निकायों का राष्ट्रीय स्तर पर एकरूप होना आवश्यक है।
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