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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) की विधिक शक्तियों तथा न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित एनजीटी (NGT) देश का एकमात्र ऐसा विशेष वैधानिक निकाय है जिसे पर्यावरण से जुड़े मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के सख्त नियमों का पालन करने से छूट प्राप्त है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) के आधार पर कार्य करता है।
- 2. 'मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय बनाम भारत संघ' या NGT के अधिकारक्षेत्र से संबंधित न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि अधिकरण को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 5 या अन्य संबन्धित अधिनियमों के अंतर्गत स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की व्यापक विधिक शक्ति प्राप्त है, यदि कोई गंभीर पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होता है।
- 3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील केवल भारत के उच्चतम न्यायालय में ही की जा सकती है, और अधिकरण के फैसलों के खिलाफ देश के किसी भी उच्च न्यायालय के समक्ष रिट अधिकारक्षेत्र (Article 226) के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई है। यह CPC के सख्त नियमों से बाध्य नहीं है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर कार्य करता है। कथन 2 गलत है: सर्वोच्च न्यायालय ने 'मद्रास बार एसोसिएशन' या अन्य मामलों में स्पष्ट किया है कि NGT के पास अपने मूल अधिनियम (National Green Tribunal Act, 2010) के तहत स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है, जब तक कि कोई औपचारिक आवेदन या याचिका न दायर की जाए। कथन 3 गलत है: NGT के आदेशों के विरुद्ध अपील सीधे उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है, किंतु अधिकरण के आदेशों के विरुद्ध राज्यों के उच्च न्यायालयों में अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने का अधिकार संवैधानिक रूप से बाधित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारक्षेत्र संविधान के 'मूल ढाँचे' का हिस्सा है (जैसा कि मद्रास उच्च न्यायालय के एक निर्णय में भी स्पष्ट किया गया था)। अतः केवल कथन 1 सही है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 202' से 'अनुच्छेद 207' तक उल्लिखित 'राज्य विधानमंडल की वित्तीय प्रक्रिया और धन विधेयकों' (Financial Procedures and Money Bills) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 199 के अनुसार, कोई विधेयक 'धन विधेयक' (Money Bill) तभी माना जाएगा जब उसमें केवल ऐसे उपबंध शामिल हों जो करों के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन, अथवा राज्य की संचित निधि से धन के विनियोजन से संबंधित हों, और यदि किसी विधेयक में धन संबंधी मामलों के साथ-साथ अन्य गैर-वित्तीय मामले भी मिला दिए जाते हैं, तो वह स्वतः एक धन विधेयक बन जाता है।
2. 'राज्य के वित्त विधेयक' (Financial Bills) के संदर्भ में, अनुच्छेद 207 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि ऐसा कोई भी विधेयक जो राज्य की संचित निधि से व्यय उपबंधित करता है, राज्य विधानसभा में तब तक पुनर्स्थापित या पारित नहीं किया जा सकता जब तक कि राज्यपाल ने उस विधेयक को उस विधानसभा में विचार के लिए संस्तुति (Recommendation) न दे दी हो।
3. राज्य विधान परिषद (Legislative Council) को किसी धन विधेयक के संबंध में अत्यंत सीमित शक्तियां प्राप्त हैं; वह न तो धन विधेयक को अस्वीकार कर सकती है और न ही उसमें संशोधन कर सकती है, तथा उसे विधानसभा द्वारा पारित किए जाने के पश्चात अधिकतम चौदह दिनों की अवधि के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिशों के विधानसभा को वापस लौटाना होता है, अन्यथा उस अवधि की समाप्ति पर वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 110' के अंतर्गत 'धन विधेयक' (Money Bill) की परिभाषा और इसकी विधायी प्रक्रिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार कोई विधेयक 'धन विधेयक' तभी माना जाएगा जब उसमें केवल ऐसे उपबंध शामिल हों जो कर लगाने, उधार लेने, भारत की संचित निधि या लोक लेखा से धन निकालने या जमा करने से संबंधित हों, तथा यदि किसी विधेयक में कर लगाने के साथ-साथ किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा स्थानीय प्रयोजनों के लिए कर लगाने (Local Taxation) का उपबंध भी शामिल कर दिया जाए, तो वह धन विधेयक नहीं रह जाता है।
2. लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) का यह निर्णय अंतिम होता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, और इस निर्णय को किसी भी न्यायालय में, संसद के किसी भी सदन में या राष्ट्रपति द्वारा भी चुनौती नहीं दी जा सकती है।
3. धन विधेयक को केवल लोकसभा में ही पुनःस्थापित (Introduce) किया जा सकता है, और राज्यसभा को इस विधेयक को पारित करने या संशोधन करने के संबंध में विस्तृत शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिसके तहत राज्यसभा इसे अधिकतम 30 दिनों की अवधि के लिए रोक सकती है और यदि इस अवधि में राज्यसभा इसे नहीं लौटाती है, तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 76' के अंतर्गत भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और 'अनुच्छेद 165' के अंतर्गत महाधिवक्ता (Advocate General) के पदों एवं उनके अधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महान्यायवादी भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित (Qualified) हो, और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) अपने पद पर बना रहता है।
2. भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे संसद की किसी भी समिति की कार्यवाही में मतदान देने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
3. राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, और इसके लिए यह आवश्यक है कि वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने की योग्यता रखता हो, तथा अपने पद पर रहते हुए वह निजी वकालत (Private practice) से पूरी तरह वंचित होता है और किसी भी आपराधिक मामले में राज्य सरकार के विरुद्ध पैरवी नहीं कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 123' के अंतर्गत 'राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति' (Ordinance-making Power) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति किसी अध्यादेश को केवल तभी प्रख्यापित कर सकता है जब संसद के दोनों सदन सत्र में नहीं होते हैं, और राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है।
2. अध्यादेश जारी करने की राष्ट्रपति की शक्ति संसद की विधि बनाने की शक्ति के समान व्यापक होती है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति उन सभी विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिन पर संसद कानून बना सकती है, और इसके तहत संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन भी किया जा सकता है।
3. संसद के पुनः समवेत होने पर प्रत्येक अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना अनिवार्य होता है, और यदि संसद के पुनर्गठन के बाद दोनों सदनों द्वारा इसे अस्वीकार करने वाला संकल्प पारित कर दिया जाता है, तो यह अध्यादेश संसद द्वारा अनुमोदन न मिलने पर तुरंत निष्प्रभावी हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद राष्ट्रपति को 'क्षमादान की शक्ति' प्रदान करता है?
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