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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) की विधिक शक्तियों तथा अधिकारक्षेत्र के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 और 15 के तहत NGT को पर्यावरण से जुड़े उन सभी सिविल मामलों में न्यायनिर्णयन की व्यापक शक्ति प्राप्त है जो अधिनियम की अनुसूची I में सूचीबद्ध सात विशिष्ट पर्यावरण कानूनों (जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम आदि) के प्रवर्तन से संबंधित हैं।
  2. 2. 'सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' या NGT से जुड़े अन्य न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया गया है कि अधिकरण के पास पर्यावरण संबंधी मामलों में आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के मामलों को छोड़कर, अपने स्वयं के आदेशों, निर्देशों या निर्णयों की अवमानना के लिए सिविल अवमानना (Civil Contempt) के तहत दंडित करने की वही शक्ति प्राप्त है जो देश के उच्च न्यायालयों को होती है।
  3. 3. 'सेव मोनोआ बेसिन कमिटी बनाम भारत संघ' और अन्य मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि NGT के किसी भी आदेश या निर्णय के विरुद्ध सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने से पहले aggrieved party (व्यथित पक्षकार) को संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष रिट याचिका दायर करना एक अनिवार्य और पूर्ववर्ती शर्त (Condition Precedent) है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 और 15 के तहत NGT को अधिनियम की अनुसूची I में उल्लिखित सात विशिष्ट कानूनों (जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974, जल सेकर अधिनियम 1977, वन संरक्षण अधिनियम 1980, वायु प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1981, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम 1991, और जैव विविधता अधिनियम 2002) से जुड़े सिविल मामलों में पर्यावरण संरक्षण और क्षतिपूर्ति के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने की शक्ति प्राप्त है। कथन 2 गलत है: मूल राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत NGT को अपनी स्वयं की अवमानना (Contempt) के लिए दंडित करने की कोई शक्ति प्रत्यक्ष रूप से प्रदान नहीं की गई थी, और न ही इसे उच्च न्यायालयों जैसी अवमानना शक्तियाँ प्राप्त हैं (अधिकरण अपनी अवमानना के मामलों को सीधे निष्पादित करने के बजाय संबंधित कानूनों के तहत दंडात्मक कार्यवाही के लिए मजिस्ट्रेट या अन्य मंचों का सहारा लेता है)। कथन 3 गलत है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 22 के अनुसार, NGT के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील सीधे भारत के उच्चतम न्यायालय में ही की जा सकती है, और इसके लिए उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका दायर करना अनिवार्य पूर्ववर्ती शर्त नहीं है, बल्कि उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 226/227) के तहत NGT के निर्णयों को चुनौती देने पर वैधानिक सीमाएँ और न्यायिक प्रतिबंध लागू होते हैं।
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