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भारतीय राजव्यवस्था के अंतर्गत 'संसदीय विशेषाधिकार' (Parliamentary Privileges - अनुच्छेद 105 और 194) तथा 'संसद सदस्यों की अयोग्यता' (Anti-Defection Law - दसवीं अनुसूची) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अनुसार, संसद के किसी भी सदस्य द्वारा सदन में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी मत के संबंध में देश के किसी भी न्यायालय में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती है, और यह उन्मुक्ति सदन के बाहर दिए गए बयानों पर भी समान रूप से लागू होती है बशर्ते वे बयान विधायी कामकाज से संबंधित हों।
- 2. दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के अंतर्गत किसी विधायक या सांसद को अयोग्य ठहराने का अंतिम और निर्णायक क्षेत्राधिकार केवल संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) का होता है, और पीठासीन अधिकारी द्वारा इस संदर्भ में लिए गए निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को 'किहोटो होलोहन बनाम जाचूहो (1992)' मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्णतः असंवैधानिक और वर्जित घोषित कर दिया गया है।
- 3. 'किहोटो होलोहन' मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुसार, पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है, सिवाय उस स्थिति के जब वह निर्णय mala fide (दुराशय), प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन या घोर अवैधता (perversity) पर आधारित हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 105(2) के तहत मिलने वाली उन्मुक्ति केवल संसद के भीतर (सदन के अंदर या उसकी समितियों में) कही गई बातों या दिए गए मतों तक ही सीमित है। यह उन्मुक्ति सदन के बाहर या सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयानों पर लागू नहीं होती है, भले ही वे विधायी कार्यों से जुड़े हों (जैसा कि पी.वी. नरसिम्हा राव मामले और अन्य फैसलों में स्पष्ट किया गया है)।
कथन 2 गलत है: 'किहोटो होलोहन बनाम जाचूहो (1992)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची के पैरा 7 को छोड़कर इसके बाकी प्रावधानों को वैध ठहराया था, किंतु न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से कहा था कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर नहीं है। पीठासीन अधिकारी का निर्णय अंतिम नहीं होता; उस पर न्यायालय द्वारा समीक्षा की जा सकती है।
कथन 3 सही है: 'किहोटो होलोहन (1992)' मामले की बहुसंख्यक पीठ (Majority Judgment) ने यह निर्धारित किया था कि दलबदल के मामलों में पीठासीन अधिकारी एक न्यायाधिकरण (Tribunal) के रूप में कार्य करता है, और उसके आदेश न्यायालय की न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायिक समीक्षा तभी की जा सकती है जब निर्णय में mala fide (दुराशय), प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice) का उल्लंघन या घोर अवैधता पाई जाए।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत 'प्रशासनिक संबंधों' (Administrative Relations - अनुच्छेद 256 से 263) तथा केंद्र-राज्य वित्तीय व प्रशासनिक शक्तियों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 256 के अनुसार प्रत्येक राज्य की कार्यकारी शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा जिससे संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित हो सके, और संघ की कार्यकारी शक्ति राज्य को ऐसे निर्देश देने तक विस्तारित होती है जो इस प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हों।
2. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को 'अंतर-राज्य परिषद' (Inter-State Council) की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और इस परिषद का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना, उन पर बहस करना तथा ऐसे विषयों पर संस्तुति करना है जिनमें राज्यों के साझा हित हों।
3. संविधान के अनुच्छेद 315 के अनुसार दो या अधिक राज्यों के लिए एक संयुक्त लोक सेवा आयोग (Joint State Public Service Commission) का गठन संसद द्वारा किया जा सकता है, बशर्ते संबंधित राज्यों के विधानमंडल इस आशय के संकल्प पारित कर दें, और इस संयुक्त आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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1858 के एक्ट का मुख्य उद्देश्य क्या था?
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भारतीय राजव्यवस्था के संदर्भ में, भारतीय संविधान की 'सातवीं अनुसूची' (Seventh Schedule) के अंतर्गत संघ, राज्य और समवर्ती सूचियों (Union, State, and Concurrent Lists) तथा विधायी शक्तियों के वितरण के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुच्छेद 246 के तहत विधायी विषयों का त्रिविध वितरण किया गया है, जिसमें 'संघ सूची' (List I) में मूल रूप से 97 विषय थे जो वर्तमान में बढ़कर 100 हो गए हैं, 'राज्य सूची' (List II) में मूल रूप से 66 विषय थे जिन्हें घटाकर वर्तमान में 61 कर दिया गया है, और 'समवर्ती सूची' (List III) में मूल रूप से 47 विषय थे जिन्हें 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा बढ़ाकर 52 कर दिया गया है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा राज्य सूची के पाँच महत्वपूर्ण विषयों—शिक्षा, वन, वन्यजीवों और पक्षियों का संरक्षण, नाप-तोल, तथा न्याय का प्रशासन (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के गठन को छोड़कर)—को समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया गया था।
3. यदि संघ सूची या समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद द्वारा बनाई गई विधि और राज्य सूची के किसी विषय पर राज्य विधानमंडल द्वारा बनाई गई विधि के बीच कोई असंगति या विरोधाभास उत्पन्न होता है, तो हमेशा राज्य विधानमंडल की विधि को सर्वोच्चता प्राप्त होगी, भले ही वह समवर्ती सूची का मामला क्यों न हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) और 'अनुच्छेद 226' के अंतर्गत उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता के बीच तुलनात्मक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय न केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बल्कि किसी अन्य कानूनी उद्देश्य (Any Other Purpose) के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं, जिससे उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का दायरा सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में अधिक विस्तृत हो जाता है।
2. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय किसी व्यक्ति या प्राधिकरण के विरुद्ध केवल तभी रिट जारी कर सकता है जब वह प्राधिकार भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर स्थित हो, जबकि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय उस स्थिति में भी भारत के बाहर स्थित व्यक्ति या सरकार के विरुद्ध रिट जारी कर सकता है यदि वह प्राधिकार उच्च न्यायालय की प्रादेशिक अधिकारिता के अधीन आने वाले राज्य के भीतर से प्रभावित होता हो या कार्य करता हो।
3. राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) के दौरान अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर अन्य सभी मूल अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित किया जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार भी निलंबित हो जाता है, किंतु इस अवधि के दौरान भी उच्च न्यायालयों की अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति स्वतः समाप्त नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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