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भारतीय कला और वास्तुकला के इतिहास के संदर्भ में, बौद्ध स्तूपों (Buddhist Stupas) की वास्तुकला, उनके विभिन्न अंगों तथा उनके प्रतीकात्मक और धार्मिक महत्व के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. स्तूप की वास्तुकला में प्रयुक्त 'हरमिका' (Harmika) स्तूप के शीर्ष पर स्थित एक चौकोर रेलिंग जैसी संरचना होती है, जो उस पवित्र स्थान का प्रतीक है जहाँ देवताओं का निवास माना जाता है या जहाँ बुद्ध के अवशेषों की सर्वोच्च पवित्रता सुरक्षित है।
- 2. 'मेधि' (Medhi) एक वृत्ताकार या चौकोर ऊँचा चबूतरा होता है जिस पर स्तूप का मुख्य अर्धगोलाकार अंड (Anda) निर्मित होता है, और इसका उपयोग बौद्ध भिक्षुओं द्वारा स्तूप के चारों ओर पवित्र परिक्रमा (Pradakshina) करने के लिए एक ऊपरी पथ के रूप में किया जाता है।
- 3. सांची और भरहुत के प्रारंभिक शुंग-सातवाहन कालीन स्तूपों में पाए जाने वाले 'तोरण' (Toranas) और पत्थर की रेलिंग (Vedika) मूल रूप से लकड़ी की बढ़ईगीरी (Woodcraft and carpentry techniques) की नकल पर आधारित हैं, जो प्राचीन भारत में पत्थर के काम से पहले लकड़ी की वास्तुकला की गहरी परंपरा को दर्शाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: 'हरमिका' (Harmika) स्तूप के अर्धगोलाकार 'अंड' के ठीक ऊपर शीर्ष पर स्थित एक चौकोर रेलिंग या बाड़े जैसी संरचना होती है। यह बौद्ध वास्तुकला में पवित्रता के उच्चतम बिंदु और देवताओं के निवास (देवलोक) का प्रतीक है।
कथन 2 सही है: 'मेधि' वह ऊँचा वृत्ताकार चबूतरा होता है जिस पर मुख्य अंड टिका होता है। इसका उपयोग श्रद्धालुओं और भिक्षुओं द्वारा स्तूप के चारों ओर ऊपरी तल पर परिक्रमा (Pradakshina) करने के लिए किया जाता है (इसके अलावा भूतल पर भी परिक्रमा पथ होता है)।
कथन 3 सही है: सांची, भरहुत और अमरावती के स्तूपों में पाए जाने वाले 'तोरण' (प्रवेश द्वार) और 'वेदिका' (रेलिंग्स) इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि वे प्रारंभिक लकड़ी की निर्माण शैलियों और बढ़ईगीरी की तकनीकों से अत्यधिक प्रेरित थे। कारीगरों ने लकड़ी के जोड़ों, कीलों और डिजाइनों को पत्थर में बेहद सटीकता से उकेरा, जो प्राचीन भारतीय शिल्प परंपरा को दर्शाता है। अतः तीनों कथन सही हैं।
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सामान्य विज्ञान और पर्यावरण के संदर्भ में, 'ओपन ओशन फर्टिलाइजेशन' (Ocean Fertilization) या 'लौह निषेचन' तकनीक और इसके पर्यावरणीय प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महासागरीय लौह निषेचन एक ऐसी भू-इंजीनियरिंग (Geo-engineering) तकनीक है जिसमें महासागरों के उन क्षेत्रों में जहाँ पोषक तत्वों की प्रचुरता है किंतु फाइटोप्लांकटन (Phytoplankton) की कमी है, कृत्रिम रूप से सूक्ष्म मात्रा में आयरन (लौह) का छिड़काव किया जाता है।
2. इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य फाइटोप्लांकटन के विकास (Bloom) को उत्तेजित करना है, जो प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) को अवशोषित करते हैं, जिससे वैश्विक तापन को कम करने में सहायता मिल सकती है।
3. यद्यपि यह तकनीक कार्बन को अवशोषित करने में सहायक हो सकती है, किंतु इसके नकारात्मक प्रभावों में महासागरों में ऑक्सीजन की कमी (Ocean Deoxygenation or Dead Zones) और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के प्राकृतिक संतुलन में व्यवधान उत्पन्न होना शामिल है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 76' के अंतर्गत 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General for India) के पद, अधिकारों और उसकी कार्यप्रणाली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित (Qualified) हो, तथा संविधान में महान्यायवादी के लिए कोई निश्चित पदावधि (Fixed Term) तय नहीं की गई है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) पद धारण करता है।
2. महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है और उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में तथा संसद की किसी भी समिति में, जिसका वह सदस्य नामित किया गया हो, बोलने और भाग लेने का अधिकार है, किंतु उसे संसद में मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
3. महान्यायवादी को भारत सरकार के एक पूर्णकालिक विधि अधिकारी (Full-time legal officer) के रूप में कार्य करना होता है, और उसे निजी वकालत (Private practice) करने तथा किसी अन्य आपराधिक या दीवानी मामले में केंद्र सरकार के खिलाफ सलाह देने या पेश होने पर पूर्ण संवैधानिक प्रतिबंध होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी संबंधों (Centre-State Legislative Relations) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार, संसद को संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, तथा संसद द्वारा बनाए गए कानून इस आधार पर अवैध नहीं ठहराए जा सकते कि उनका बहिर्क्षेत्रीय प्रवर्तन (Extraterritorial Operation) है।
2. अनुच्छेद 249 के तहत यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से एक संकल्प पारित करती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी भी विषय पर कानून बनाए, तो संसद को देश के संपूर्ण राज्य क्षेत्र के लिए उस विषय पर विधि बनाने की शक्ति मिल जाती है, और यह संकल्प अनिश्चित काल तक प्रभावी रहता है जब तक कि राज्य सभा इसे रद्द नहीं करती।
3. जब किसी राज्य में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू होता है, तब उस राज्य की विधायिका की विधि निर्माण की शक्तियाँ संसद में निहित हो जाती हैं, तथा राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद संसद द्वारा बनाए गए ऐसे कानून तब तक प्रभावी रहते हैं जब तक संबंधित राज्य विधानमंडल द्वारा उन्हें स्पष्ट रूप से निरस्त नहीं कर दिया जाता।
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