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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, 'सामूहिक उत्तरदायित्व' (Collective Responsibility) तथा 'विश्वास मत' (Vote of Confidence) की लोकतांत्रिक पद्धतियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, जिसका विधिक एवं संवैधानिक अर्थ यह है कि मंत्रिमंडल का प्रत्येक निर्णय पूरी मंत्रिपरिषद का निर्णय माना जाता है और यदि लोकसभा में सरकार के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है या कोई महत्वपूर्ण सरकारी विधेयक गिर जाता है, तो संपूर्ण सरकार को त्यागपत्र देना पड़ता है।
- 2. 'विश्वास मत' (Vote of Confidence) की अवधारणा का स्पष्ट उल्लेख मूल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 या किसी अन्य अनुच्छेद में नहीं किया गया है, बल्कि यह संसदीय लोकतंत्र और दलबदल विरोधी कानूनों की पृष्ठभूमि में विकसित एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से गठबंधन सरकारों या अल्पमत सरकारों को सदन में अपना बहुमत साबित करने का अवसर दिया जाता है।
- 3. 'एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि किसी भी राज्य में सरकार के बहुमत का परीक्षण राज्यपाल के राजभवन में उसकी वैयक्तिक संतुष्टि के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसके लिए एकमात्र संवैधानिक और अनिवार्य मंच राज्य की विधानसभा ही है, जहाँ फ्लोर टेस्ट (Floor Test) के माध्यम से बहुमत का निर्धारण किया जाना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार, मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। इसका अर्थ यह है कि मंत्रिमंडल का प्रत्येक निर्णय संपूर्ण सरकार का निर्णय होता है और यदि संसद के निचले सदन (लोकसभा) में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए या कोई नीतिगत सरकारी विधेयक पराजित हो जाए, तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है।
कथन 2 सही है: 'विश्वास मत' (Vote of Confidence) शब्द का उल्लेख मूल संविधान के किसी भी अनुच्छेद में नहीं है। यह संसदीय लोकतंत्र के विकास का एक परिणाम है, जिसका उपयोग अक्सर तब किया जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल को किसी सरकार के बहुमत पर संदेह होता है और वे सदन में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश देते हैं।
कथन 3 सही है: 'एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' ऐतिहासिक मामले में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि किसी सरकार का बहुमत परीक्षण राज्यपाल के राजभवन में व्यक्तिगत आकलन के आधार पर नहीं, बल्कि राज्य विधानसभा के पटल (Floor Test) पर ही होना चाहिए।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' और उसके प्रकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का संशोधन संसद के किसी भी सदन में इस प्रयोजन के लिए विधेयक प्रस्तुत करके ही आरंभ किया जा सकता है, और इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेना अनिवार्य होता है।
2. संविधान के कुछ विशिष्ट प्रावधानों, जैसे कि राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया या संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व, में संशोधन करने के लिए न केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक है, बल्कि कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से उसका अनुसमर्थन (Ratification) किया जाना भी अनिवार्य है।
3. अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के 'केशवानंद भारती वाद (1973)' के निर्णय के अनुसार, संसद अपनी इस संविधान संशोधन शक्ति का प्रयोग करके संविधान के 'मूल ढांचा' (Basic Structure) को नष्ट या समाप्त नहीं कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' के अंतर्गत 'पंचायतें' (Panchayats - अनुच्छेद 243 से 243-O) तथा '73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992' के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 243-G के अनुसार राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ तैयार करने तथा उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी सौंप सकता है, जिसमें ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध 29 विषयों से संबंधित मामले शामिल हैं।
2. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली (ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर और जिला स्तर) का प्रावधान किया गया, किंतु जिन राज्यों की जनसंख्या बीस लाख से कम है, उन्हें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन न करने की छूट प्रदान की गई है।
3. संविधान के अनुच्छेद 243-E के अनुसार प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक के लिए नियत तारीख से पाँच वर्ष का होता है, और यदि किसी पंचायत को समय से पूर्व विघटित कर दिया जाता है, तो विघटन की तारीख से छह महीने की अवधि समाप्त होने से पहले उस स्थान को भरने के लिए चुनाव कराना अनिवार्य होता है, तथा नव-गठित पंचायत अपने पूरे पाँच वर्ष के कार्यकाल के लिए कार्य करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, भारत में 'हरित बॉन्ड' (Green Bonds) और संप्रभु हरित बॉन्ड (Sovereign Green Bonds - SGrBs) के प्रावधानों तथा उनके वित्तपोषण के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संप्रभु हरित बॉन्ड ऐसे ऋण उपकरण हैं जिन्हें सरकार द्वारा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से पूंजी जुटाने के लिए जारी किया जाता है, और इनसे प्राप्त होने वाली आय का उपयोग विशेष रूप से उन सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं के वित्तपोषण या पुनर्वित्तपोषण के लिए किया जाता है जो अर्थव्यवस्था में कार्बन तीव्रता को कम करने में सहायता करती हैं।
2. भारत के पहले संप्रभु हरित बॉन्ड फ्रेमवर्क के अनुसार, इन बॉन्डों की बिक्री से प्राप्त राशि को भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा किया जाता है और फिर आवश्यकतानुसार सामान्य बजटीय घाटे को पूरा करने के लिए उपयोग किया जाता है।
3. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के तहत, इन संप्रभु हरित बॉन्डों में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों को 'सांविधिक तरलता अनुपात' (SLR) आवश्यकताओं से पूर्ण छूट प्राप्त होती है, और उन्हें 'निर्दिष्ट प्रतिभूति' (Specified Securities) के रूप में पूरी तरह से विहित किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने सार्वजनिक क्षेत्र की लेखा परीक्षा में सहयोग बढ़ाने के लिए किस देश के साथ MoU पर हस्ताक्षर किए हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत 'संघ और राज्यों के बीच प्रशासनिक संबंध' (Administrative Relations - अनुच्छेद 256 से 263) तथा उससे संबंधित प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 256 के अनुसार प्रत्येक राज्य की कार्यकारी शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा जिससे संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और उस राज्य में लागू किसी भी पूर्ववर्ती केंद्रीय कानून का अनुपालन सुनिश्चित हो सके, और संघ सरकार को यह शक्ति प्राप्त है कि वह इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राज्य को आवश्यक निर्देश दे सके।
2. संविधान के अनुच्छेद 262 के अंतर्गत संसद को विधि द्वारा किसी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन के लिए उपबंध करने की शक्ति प्राप्त है, और संसद विधि द्वारा यह भी उपबंध कर सकती है कि ऐसे किसी भी विवाद में उच्चतम न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय की अधिकारिता (Jurisdiction) नहीं होगी।
3. संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि किसी समय यह प्रतीत हो कि एक अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) की स्थापना से लोकहित की प्राप्ति होगी, तो वह ऐसी परिषद की स्थापना कर सकता है, और यह परिषद अनिवार्य रूप से एक स्थायी सांविधिक निकाय (Permanent Statutory Body) है जिसकी स्थापना संसद के एक अधिनियम के माध्यम से की गई है।
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