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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, 'संसदीय विशेषाधिकार' (Parliamentary Privileges) तथा उनके उल्लंघन से जुड़े मामलों में न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 105 और अनुच्छेद 194 क्रमशः संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों तथा उनके सदनों को विभिन्न विशेषाधिकार प्रदान करते हैं, और यदि संविधान के किसी अन्य प्रावधान और संसदीय विशेषाधिकारों के बीच टकराव उत्पन्न होता है, तो अनुच्छेद 105 के अंतर्गत प्राप्त विशेषाधिकारों को अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) जैसे मौलिक अधिकारों पर सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त होती है।
  2. 2. 'के. केसवन बनाम केरल राज्य' और 'विशेष संदर्भ संख्या 1 (उत्तर प्रदेश विधानसभा मामला, 1964)' में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि यदि विधायिका किसी व्यक्ति को अपने विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) के लिए दंडित करती है, तो न्यायपालिका को यह समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार है कि क्या वह विशेषाधिकार वास्तव में संविधान द्वारा प्रदत्त था और क्या प्रक्रिया उचित थी।
  3. 3. ब्रिटेन की संसद के विपरीत, भारत में संसद या राज्य विधानमंडलों के विशेषाधिकार पूरी तरह से लिखित और संहिताबद्ध (Codified) हैं, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105(3) और 194(3) के प्रारंभिक संशोधनों के पश्चात ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की परंपराओं पर आधारित सभी अनिर्दिष्ट विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: 'एम.एस. एम. शर्मा बनाम श्रीकृष्ण सिन्हा (रावण मामला)' तथा 'गुंड़ाराव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' जैसे ऐतिहासिक मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि संसदीय विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105 और 194) मौलिक अधिकारों के अधीन हैं। यानी, यदि संसद या विधानमंडल का कोई विशेषाधिकार किसी नागरिक के अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) या अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता मिलेगी, न कि विशेषाधिकारों को। कथन 2 सही है: 'विशेष संदर्भ संख्या 1 (1964)' के ऐतिहासिक मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि हालांकि विधायिका को अपने विशेषाधिकारों के हनन के मामलों में दंडित करने का अनन्य अधिकार है, किंतु न्यायपालिका (उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय) यह परीक्षण कर सकती है कि क्या वह विशेषाधिकार वास्तव में अस्तित्व में था या नहीं, और क्या सदन द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया संवैधानिक सीमाओं के भीतर थी। कथन 3 गलत है: ब्रिटेन की संसद के विपरीत, भारत में संसद और राज्य विधानमंडलों के विशेषाधिकार आज तक पूरी तरह से संहिताबद्ध (Fully Codified) नहीं किए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 105(3) और 194(3) के अनुसार, जब तक संसद या राज्य विधानमंडल अपने विशेषाधिकारों को कानून बनाकर संहिताबद्ध नहीं करते, तब तक वे वही विशेषाधिकार प्राप्त करते रहेंगे जो 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय ब्रिटेन के 'हाउस ऑफ कॉमन्स' (House of Commons) को प्राप्त थे।
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