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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' और 'अनुच्छेद 226' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारक्षेत्र (Writ Jurisdiction) एवं लोकहित याचिका (PIL) के विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, जबकि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को न केवल मौलिक अधिकारों बल्कि किसी अन्य उद्देश्य (जैसे सामान्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन) के लिए भी रिट जारी करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, और उच्च न्यायालयों का यह रिट अधिकारक्षेत्र उनका एक अनन्य (Exclusive) अधिकार है जिसे संसद विधि द्वारा भी सर्वोच्च न्यायालय को हस्तांतरित नहीं कर सकती है।
  2. 2. 'पी. एन. भगवती' के नेतृत्व में 1980 के दशक में विकसित 'लोकहित याचिका' (PIL) की अवधारणा ने पारंपरिक 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi - यानी केवल पीड़ित व्यक्ति द्वारा ही अदालत जाने का नियम) को शिथिल कर दिया, जिसके तहत अब समाज का कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति या सामाजिक संगठन समाज के शोषित, वंचित या गरीबों के मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
  3. 3. 'चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि उच्च न्यायालयों का अनुच्छेद 226 के अंतर्गत प्राप्त रिट अधिकारक्षेत्र संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) का एक अभिन्न हिस्सा है, और संसद किसी भी सांविधिक न्यायाधिकरण (Tribunal) की स्थापना करके उच्च न्यायालयों के इस न्यायिक समीक्षा के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है। यद्यपि अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र केवल मौलिक अधिकारों तक सीमित है और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों का दायरा व्यापक है (मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य उद्देश्यों के लिए भी), उच्च न्यायालयों का यह रिट अधिकारक्षेत्र 'अनन्य' (Exclusive) नहीं है। अनुच्छेद 32 स्वयं एक मौलिक अधिकार है और सर्वोच्च न्यायालय का रिट अधिकारक्षेत्र उच्च न्यायालयों के साथ समवर्ती (Concurrent) है। इसके अलावा, संसद संविधान के अनुच्छेद 32(3) के तहत किसी अन्य न्यायालय (जैसे निचले स्तर के न्यायालयों) को भी देश में किसी भी प्रकार की रिट जारी करने की शक्ति दे सकती है, हालांकि ऐसा अभी तक नहीं किया गया है। कथन 2 सही है। 1980 के दशक की शुरुआत में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्णा अय्यर के प्रयासों से जनहित याचिका (PIL) की शुरुआत हुई। इसने पारंपरिक 'लोकस स्टैंडी' के सिद्धांत को समाप्त कर दिया, जिससे समाज के किसी भी जनहितैषी व्यक्ति या संस्था को अदालत में याचिका दायर करने की अनुमति मिल गई यदि पीड़ित स्वयं असमर्थ है। कथन 3 सही है। 'एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ (1997)' के ऐतिहासिक मामले में उच्चतम न्यायालय की 7-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 323A और 323B के तहत स्थापित प्रशासनिक न्यायाधिकरणों (Administrative Tribunals) के आदेशों की प्रारंभिक समीक्षा संबंधित उच्च न्यायालयों के अनुच्छेद 226 के अधिकार क्षेत्र के अधीन होगी, और उच्च न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा की यह शक्ति संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य अंग है जिसे संसद द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है।
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