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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत राष्ट्रपति की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) तथा इससे संबंधित न्यायिक निर्णयों और प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में, ऐसे मामलों में जिनमें दंड या दंडादेश संघ की कार्यकारी शक्ति के विस्तार वाले विषय के विरुद्ध किसी विधि के विरुद्ध दिया गया है, और ऐसे मामलों में जहाँ मृत्युदंड दिया गया है, क्षमा, प्रवિલंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है।
- 2. 'केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989)' और 'एतवा उरांव बनाम झारखंड राज्य' मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूर्णतः बाहर है, क्योंकि यह एक संप्रभु कार्यकारी विशेषाधिकार है, और राष्ट्रपति के निर्णय के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई अपील नहीं की जा सकती, भले ही निर्णय दुर्भावनापूर्ण या भेदभावपूर्ण हो।
- 3. 'मारु राम बनाम भारत संघ (1980)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 (राज्यपाल की क्षमादान शक्ति) के अंतर्गत शक्तियों का प्रयोग राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा अपने वैयक्तिक स्वविवेक से नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही किया जाना अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के अनुसार राष्ट्रपति को तीन प्रमुख श्रेणियों में क्षमादान की शक्ति प्राप्त है - (क) सभी मामलों में जहाँ दंड या दंडादेश सेना न्यायालय द्वारा दिया गया है; (ख) ऐसे मामलों में जहाँ दंड या दंडादेश ऐसे किसी विषय के विरुद्ध किसी विधि के तहत दिया गया है जिस तक संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है; और (ग) ऐसे मामलों में जहाँ दंडादेश मृत्युदंड है।
कथन 2 गलत है: उच्चतम न्यायालय ने 'ईश्वर सिंह बनाम भारत संघ' और 'केहर सिंह बनाम भारत संघ' सहित कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह मुक्त नहीं है। यद्यपि यह शक्ति एक कार्यकारी विशेषाधिकार है, किंतु यदि राष्ट्रपति का निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना (Arbitrary), दुर्भावनापूर्ण (Malafide), या किसी राजनीतिक/सांप्रदायिक आधार पर भेदभावपूर्ण पाया जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत उसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है।
कथन 3 सही है: 'मारु राम बनाम भारत संघ (1980)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के अंतर्गत राष्ट्रपति और राज्यपाल अपनी शक्तियों का प्रयोग व्यक्तिगत या स्वविवेक से नहीं करते हैं, बल्कि वे मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) की सलाह और सहायता से कार्य करने के लिए बाध्य होते हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' (राज्य के नीति निर्देशक तत्व - अनुच्छेद 36 से 51) तथा 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार राज्य के नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु ये न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय (Non-justiciable) हैं अर्थात् इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा बलपूर्वक लागू नहीं कराया जा सकता है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों पर संविधान में 'मूल कर्तव्यों' को जोड़ा गया, और वर्तमान में अनुच्छेद 51क के अंतर्गत कुल 11 मूल कर्तव्य हैं, जिनमें से 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच के अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करने का कर्तव्य जोड़ा गया था।
3. नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद 48क में पर्यावरण का संरक्षण तथा संवहन और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रावधान किया गया है, जिसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा ही संविधान में अंतःस्थापित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' (केंद्र-राज्य विधायी संबंध - अनुच्छेद 245 से 255) के अंतर्गत प्रदत्त प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार संसद को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है, और किसी राज्य के विधानमंडल को उस राज्य के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति है, किंतु संसद द्वारा बनाई गई कोई भी विधि इस आधार पर अमान्य (Void) नहीं समझी जाएगी कि उसका बहिरादेशीय प्रवर्तन (Extraterritorial operation) होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या expedient है कि संसद राज्य सूची में प्रयुक्त किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद को पूरे भारत या उसके किसी भाग के लिए उस विषय पर कानून बनाने की शक्ति मिल जाती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 252 के अंतर्गत यदि दो या अधिक राज्यों के विधानमंडल यह संकल्प पारित करते हैं कि उन राज्यों में राज्य सूची के विषयों में से किसी विषय के संबंध में संसद को विधि बनाने की शक्ति है, तो उस विषय पर संसद द्वारा बनाई गई विधि केवल उन्हीं राज्यों पर लागू होगी जिन्होंने ऐसा संकल्प पारित किया है या जिन्होंने बाद में इसे अंगीकार किया है, तथा ऐसे अधिनियम को संशोधित या निरूपित करने की शक्ति केवल संबंधित राज्य विधानमंडल के पास होती है, संसद के पास नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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