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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 20' और 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों तथा आपातकाल के दौरान इनके संरक्षण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान का अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता (दोहरा दंड या Double Jeopardy), तथा यह अधिकार केवल पूर्वोत्तर राज्यों के निवासियों को छोड़कर सभी नागरिकों पर लागू होता है।
- 2. 'ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल' (1976) के ऐतिहासिक मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने यह बहुमत निर्णय दिया था कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का प्रवर्तन भी निलंबित किया जा सकता है, जिसे बाद में '44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978' द्वारा पलट दिया गया।
- 3. अनुच्छेद 21 के दायरे में न केवल 'दैहिक स्वतंत्रता' शामिल है, बल्कि उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुसार इसमें त्वरित विचारण का अधिकार, मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार, और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार भी अंतर्निहित रूप से शामिल है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 20 के तहत मिलने वाला संरक्षण (जैसे दोहरे दंड से मुक्ति, पूर्वोत्तर प्रभावी कानून से संरक्षण आदि) न केवल भारतीय नागरिकों को बल्कि भारत के राज्यक्षेत्र में रहने वाले सभी व्यक्तियों (चाहे वे नागरिक हों या विदेशी) को प्राप्त है, न कि केवल कुछ विशेष राज्यों को छोड़कर। कथन 2 सही है: आपातकाल के दौरान (ADM Jabalpur case, 1976) अदालत ने फैसला दिया था कि अनुच्छेद 21 भी निलंबित रहता है, जिसे 44वें संशोधन 1978 द्वारा सुधारा गया और यह तय किया गया कि अनुच्छेद 20 और 21 को कभी निलंबित नहीं किया जा सकता। कथन 3 सही है: उच्चतम न्यायालय ने 'मेनका गांधी मामले' और अन्य कई निर्णयों के बाद अनुच्छेद 21 के दायरे का अभूतपूर्व विस्तार किया है, जिसमें त्वरित विचारण, पर्यावरण, गोपनीयता, और कानूनी सहायता जैसे अधिकार शामिल हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'संसदीय विशेषाधिकार' (Parliamentary Privileges - Article 105 & 194) तथा उनकी न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद के सदस्यों को सदन के भीतर और उसकी समितियों में कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी मत के संबंध में देश के किसी भी न्यायालय में किसी भी कानूनी कार्यवाही से मुक्ति (Immunity) प्राप्त होती है, और यह उन्मुक्ति आपराधिक कृत्यों या भ्रष्टाचार के आरोपों पर भी समान रूप से लागू होती है।
2. 'पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम सीबीआई (1998)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि यदि कोई सांसद सदन में किसी प्रस्ताव के समर्थन या विरोध में मतदान करने के लिए रिश्वत लेता है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अंतर्गत आपराधिक अभियोजन से पूर्ण संवैधानिक प्रतिरक्षा (Immunity) प्राप्त है।
3. 'सत्रीय कार्य समिति बनाम झारखंड मुक्ति मोर्चा (2024)' में भारत के उच्चतम न्यायालय की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने पिछले फैसले को पलटते हुए यह स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी जैसे आपराधिक कृत्य संसदीय विशेषाधिकारों की परिधि में नहीं आते हैं, और अनुच्छेद 105 या 194 सांसदों या विधायकों को ऐसे कृत्यों के लिए अदालती कार्रवाई से बचाने का लाइसेंस नहीं देते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत किसी राज्य में 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) की घोषणा और उसके प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति शासन की घोषणा के पश्चात राज्य विधानसभा को अनिवार्य रूप से तुरंत भंग (Dissolve) कर दिया जाता है, और राज्य का संपूर्ण शासन कार्य सीधे राष्ट्रपति या उसके द्वारा नियुक्त राज्यपाल के हाथों में चला जाता है।
2. संसद द्वारा राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा का अनुमोदन दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तारीख से 'दो महीने' के भीतर साधारण बहुमत (Simple majority) से किया जाना अनिवार्य होता है।
3. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय ने 'एस. आर. बोम्बे मामले' (1994) में यह स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए राष्ट्रपति का समाधान दुर्भावनापूर्ण, अप्रासंगिक आधारों पर आधारित या शक्ति का दुरुपयोग पाए जाने पर न्यायालय द्वारा इस उद्घोषणा को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय कला, संस्कृति और प्राचीन इतिहास के संदर्भ में, बौद्ध धर्म की महायान (Mahayana) और वज्रयान (Vajrayana) शाखाओं के विकास तथा दार्शनिक मान्यताओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महायान बौद्ध धर्म में बुद्ध को एक अलौकिक शक्ति और भगवान के रूप में पूजे जाने की परंपरा शुरू हुई, तथा इसमें 'बोधिसत्व' की अवधारणा का उदय हुआ, जिसमें वे व्यक्ति जो स्वयं निर्वाण प्राप्त करने के योग्य हैं, अन्य जीवों के उद्धार के लिए अपनी मुक्ति को स्थगित कर देते हैं।
2. वज्रयान शाखा, जो मुख्य रूप से गुप्त काल के उत्तरार्ध और पाल काल के दौरान पूर्वी भारत (विशेषकर बंगाल और बिहार) में विकसित हुई, ने तांत्रिक अनुष्ठानों, मंत्रों, मुद्राओं और मंडल (Mandala) के प्रयोग को मुक्ति प्राप्ति के प्राथमिक साधन के रूप में मान्यता दी।
3. बौद्ध धर्म की शून्यवाद (Madhyamaka) विचारधारा के संस्थापक नागार्जुन थे, जिन्होंने यह प्रतिपादित किया कि समस्त वस्तुएं और धर्म 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (Dependent Origination) के कारण स्वभावतः शून्य (स्वयं के स्वतंत्र अस्तित्व से रहित) हैं, और इस दार्शनिक दृष्टिकोण को महायान बौद्ध मत का वैचारिक आधार माना जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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लीप वर्ष (Leap Year) में कुल कितने दिन होते हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 361' के अंतर्गत प्रदत्त 'राष्ट्रपति और राज्यपालों के विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां' (Immunities) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के राष्ट्रपति और किसी राज्य के राज्यपाल को अपने कार्यालय की शक्तियों और कर्तव्यों के पालन के लिए तथा उनके द्वारा किए गए या किए जाने का दावा किए जाने वाले कृत्यों के लिए देश के किसी भी न्यायालय के प्रति जवाबदेह होने से पूर्ण संवैधानिक उन्मुक्ति प्राप्त है, और उनके कार्यकाल के दौरान किसी भी न्यायालय द्वारा उनकी व्यक्तिगत क्षमता में भी कोई आपराधिक कार्यवाही (Criminal Proceedings) शुरू नहीं की जा सकती है।
2. हालांकि राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान उनकी व्यक्तिगत क्षमता (Personal Capacity) में किसी भी प्रकार की दीवानी कार्यवाही (Civil Proceedings) शुरू करने पर पूर्ण प्रतिबंध होता है, किंतु यदि उनकी व्यक्तिगत क्षमता से संबंधित किसी दीवानी मामले में उन्हें दो महीने की पूर्व लिखित सूचना (Prior Notice) दी जाती है, तो न्यायालय उनके विरुद्ध दीवानी मुकदमा चलाने की अनुमति दे सकता है।
3. अनुच्छेद 361 के प्रावधानों के तहत, राष्ट्रपति या राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान उनके विरुद्ध किसी भी न्यायालय से न तो कोई गिरफ्तारी का वारंट (Arrest Warrant) जारी किया जा सकता है और न ही उन्हें कारावास में भेजा जा सकता है, किंतु यदि वे अपने पद पर रहते हुए कोई गंभीर अपराध करते हैं, तो संसद या राज्य विधानमंडल महाभियोग या विशेष प्रस्ताव के माध्यम से उनके कार्यकाल के दौरान ही उन्हें गिरफ्तार करवा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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