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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के तहत राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) और राष्ट्रपति की शक्ति के बीच तुलनात्मक अंतर के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 161 के अधीन राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, जिसका विस्तार राज्य की कार्यकारी शक्ति के अंतर्गत आता है।
  2. 2. राज्यपाल को राज्य विधि के तहत दिए गए मृत्युदंड (Death Sentence) को क्षमा (Pardon) करने की पूर्ण संवैधानिक शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति के समान ही राज्यपाल भी मृत्युदंड के मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता है, भले ही वह मामला समवर्ती सूची का हो।
  3. 3. 'मार्-यू राम बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया' और 'श्रीकांत चंद्रकांत आचार्य बनाम महाराष्ट्र राज्य' जैसे मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति का प्रयोग राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता (Aid and Advice) के अधीन होता है, तथा राज्यपाल की यह शक्ति न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार, राज्यपाल को उस विषय से संबंधित किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार, निलंबन या लघुकरण करने की शक्ति है, जिसका विस्तार राज्य की कार्यकारी शक्ति तक है। कथन 2 गलत है: राष्ट्रपति के विपरीत, राज्यपाल को मृत्युदंड को 'क्षमा' (Pardon) करने की शक्ति प्राप्त नहीं है। भले ही राज्य विधि के अंतर्गत मृत्युदंड दिया गया हो, राज्यपाल उसे माफ नहीं कर सकता (केवल राष्ट्रपति को अनुच्छेद 72 के तहत मृत्युदंड को पूरी तरह क्षमा करने की अनन्य शक्ति प्राप्त है)। हालाँकि, राज्यपाल मृत्युदंड के निलंबन, परिहार या लघुकरण (Commutation) की शक्ति का प्रयोग कर सकता है। कथन 3 सही है: उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के अनुसार, राज्यपाल की क्षमादान शक्ति का प्रयोग राज्य मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से होता है। साथ ही, इस शक्ति का प्रयोग यदि दुर्भावनापूर्ण, मनमाना या असंवैधानिक पाया जाता है, तो यह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है।
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