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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) के गठन, शक्तियों और कार्यप्रणाली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' के अंतर्गत की गई थी, और भारत पर्यावरण मामलों के लिए एक विशेष न्यायाधिकरण स्थापित करने वाला दुनिया का तीसरा देश (ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बाद) तथा पहला विकासशील देश बन गया है।
  2. 2. NGT पर्यावरण से संबंधित सभी सिविल मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के सख्त नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्यायिक निर्णय लेते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन हो।
  3. 3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा पारित किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील सीधे केवल 90 दिनों के भीतर की जा सकती है, और अधिकरण के आदेशों की न्यायिक समीक्षा केवल संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत संबंधित उच्च न्यायालयों के माध्यम से ही की जा सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और तीव्र निपटान के लिए की गई थी। इसके साथ ही, भारत ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बाद पर्यावरणीय मुद्दों के लिए विशेष न्यायाधिकरण स्थापित करने वाला विश्व का तीसरा और पहला विकासशील देश बन गया है। कथन 2 गलत है: NGT सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के सख्त नियमों और प्रक्रियाओं से बंधा नहीं है, बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है। इससे अधिकरण को अपनी कार्यवाही में अधिक लचीलापन और तेजी मिलती है। कथन 3 गलत है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 22 के अनुसार, NGT के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील सीधे **उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)** में निर्णय की तारीख से **90 दिनों** के भीतर की जा सकती है (न कि उच्च न्यायालयों में)। NGT के आदेशों की चुनौती सीधे सर्वोच्च न्यायालय में ही होती है, उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में इसके आदेश नहीं आते हैं।
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