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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की 'क्षमादान की शक्ति' और राष्ट्रपति की 'क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72)' के बीच तुलनात्मक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिस तक राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है।
- 2. राज्यपाल को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए किसी भी प्रकार के दंड के मामले में क्षमादान, विराम या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त नहीं है, जबकि राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 72 के तहत सेना न्यायालय द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध भी क्षमादान की शक्ति होती है।
- 3. यदि किसी अपराधी को किसी राज्य में न्यायालय द्वारा मृत्युदंड (Death Sentence) की सजा सुनाई जाती है, तो संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार राज्यपाल के पास उस मृत्युदंड को पूरी तरह से क्षमा करने या बदलने की अनन्य संवैधानिक शक्ति होती है, और इस मामले में राष्ट्रपति की तुलना में राज्यपाल का क्षेत्राधिकार सर्वोपरि होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिस तक राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है।
कथन 2 सही है: राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72) और राज्यपाल (अनुच्छेद 161) की क्षमादान शक्तियों में मुख्य अंतर यह है कि राज्यपाल को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामले में क्षमादान देने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है, जबकि राष्ट्रपति के पास यह शक्ति होती है। साथ ही, राज्यपाल मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह से क्षमा नहीं कर सकता (हालांकि वह इसका प्रविलंबन या परिहार कर सकता है), जबकि राष्ट्रपति मृत्युदंड को पूरी तरह क्षमा कर सकता है।
कथन 3 गलत है: राज्यपाल के पास मृत्युदंड को पूरी तरह से क्षमा (Pardon) करने की शक्ति नहीं होती है, और न ही वह राष्ट्रपति के अधिकारों को ओवरराइड कर सकता है। मृत्युदंड के मामलों में पूर्ण क्षमादान का अधिकार केवल भारत के राष्ट्रपति के पास होता है।
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के संदर्भ में, 'सार्वजनिक वितरण प्रणाली' (Public Distribution System - PDS) तथा 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013' (NFSA) के विधिक एवं कार्यात्मक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (NFSA) के प्रावधानों के अंतर्गत देश की लगभग 75% ग्रामीण और 50% शहरी आबादी को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से रियायती दरों पर खाद्यान्न प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार दिया गया है, तथा इस अधिनियम के तहत कवर किए गए पात्र व्यक्तियों को चावल, गेहूं और मोटे अनाज क्रमशः ₹3, ₹2 और ₹1 प्रति किलोग्राम की दरों पर प्रदान किए जाते हैं।
2. NFSA, 2013 के अंतर्गत प्रत्येक पात्र परिवार की सबसे बड़ी वयस्क महिला (जो 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की हो) को 'परिवार की मुखिया' (Head of the Household) माना जाएगा, जिसके नाम पर राशन कार्ड जारी किया जाना इस अधिनियम के तहत एक अनिवार्य वैधानिक प्रावधान है ताकि लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा मिल सके।
3. 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' (Food Security Allowance) के प्रावधान के अनुसार, यदि किसी कारणवश सरकार पात्र लाभार्थियों को खाद्यान्न या कूपन उपलब्ध कराने में असमर्थ रहती है, तो लाभार्थियों को नियमानुसार केंद्र सरकार द्वारा सीधे उनके बैंक खातों में नकद हस्तांतरण (Cash Transfer) के रूप में खाद्य सुरक्षा भत्ता प्रदान किया जाएगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' (राज्य के नीति निर्देशक तत्व - अनुच्छेद 36 से 51) के अंतर्गत 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code - UCC) और इससे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह प्रावधान एक न्यायोचित (Justiciable) अधिकार है जिसे किसी भी व्यक्ति द्वारा सीधे उच्चतम न्यायालय में प्रवर्तित कराया जा सकता है यदि राज्य इसे लागू करने में असफल रहता है।
2. गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पुर्तगाली सिविल कोड, 1867 (Portuguese Civil Code) के रूप में स्वतंत्रता पूर्व से ही एक साझी पारिवारिक और नागरिक कानून व्यवस्था लागू है, जो धर्म या समुदाय के आधार पर विभेद किए बिना अधिकांश नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्णयों (जैसे शाह Bano मामला और सरला मुद्गल मामला) में यह रेखांकित किया गया है कि देश में एक समान नागरिक संहिता का अभाव राष्ट्रीय अखंडता और लैंगिक न्याय के उद्देश्य को प्राप्त करने में एक बड़ी बाधा है, तथा न्यायालय ने संसद से इस दिशा में उचित कानून बनाने का आग्रह किया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 105' और 'अनुच्छेद 194' के अंतर्गत सांसदों और विधायकों को प्राप्त 'संसदीय विशेषाधिकारों' (Parliamentary Privileges) तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 105(3) के अनुसार, संसद के दोनों सदनों, उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ वही होंगी जो समय-समय पर ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स की थीं, जब तक कि भारतीय संसद द्वारा इस संबंध में कोई विशेष कानून नहीं बनाया जाता।
2. 'पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम सीबीआई (1998)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अंतर्गत संसद के भीतर किसी भाषण देने या वोट देने के लिए रिश्वत लेने वाले सांसद को भी आपराधिक अभियोजन से पूर्ण संवैधानिक प्रतिरक्षा (Immunity) प्राप्त होती है, और इस पर साधारण आपराधिक कानून लागू नहीं हो सकते।
3. 'सीतामढ़ी मामले' (या हालिया सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के सात-न्यायाधीशों के फैसले) के संदर्भ में, न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती 1998 के फैसले को पलटते हुए यह स्पष्ट किया है कि रिश्वतखोरी के मामलों में सदन के भीतर वोट देने या भाषण देने के लिए घूस लेने वाले सांसदों और विधायकों को अनुच्छेद 105(2) या 194(2) के तहत कोई आपराधिक उन्मुक्ति प्राप्त नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचार और आपराधिक कृत्य संसदीय लोकतंत्र के सुचारू संचालन और शुचिता के मूल सिद्धांतों के विपरीत हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संसदीय कार्यवाही में शून्यकाल का समय कब होता है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत संविधान संशोधन की प्रक्रिया और इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन के दो प्रकार के बहुमतों का प्रावधान किया गया है, तथा राष्ट्रपति के लिए यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य है कि वह संविधान संशोधन विधेयक पर अपनी स्वीकृति (Assent) प्रदान करे और वह इस पर अपनी 'जेबी वीटो' (Pocket Veto) शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है।
2. 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' के ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने यह निर्धारित किया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, जिसमें संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) को बदलना या समाप्त करना भी शामिल है।
3. 'संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976' द्वारा अनुच्छेद 368 में खंड (4) और खंड (5) जोड़े गए थे, जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने 'मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)' वाद में इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया था कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अधिकार संविधान की मूल विशेषता है और इसे संसद द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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