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भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के संदर्भ में, 'सार्वभौमिक बुनियादी आय' (Universal Basic Income - UBI) की अवधारणा और इसके सैद्धांतिक व व्यावहारिक प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. सार्वभौमिक बुनियादी आय (UBI) के तहत देश के सभी नागरिकों को बिना किसी शर्त के एक निश्चित नियमित आय प्रदान की जाती है, जिसका मुख्य उद्देश्य लक्षित सब्सिडी प्रणालियों की तुलना में प्रशासनिक अक्षमताओं को दूर करना और पूर्ण गरीबी को समाप्त करना होता है।
  2. 2. आर्थिक सर्वेक्षण (2016-17) में प्रस्तुत UBI के मॉडल के अनुसार, इसमें यह सुझाव दिया गया था कि UBI को लक्षित और सशर्त कल्याणकारी योजनाओं के पूरक के रूप में लागू किया जाना चाहिए, और इसके कार्यान्वयन के लिए देश की सभी मौजूदा खाद्य सब्सिडी और उर्वरक सब्सिडी को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहिए।
  3. 3. UBI के समर्थकों का तर्क है कि यह नागरिकों को अपनी पसंद का काम चुनने और श्रम बाजार में बेहतर सौदेबाजी की शक्ति देता है, जबकि इसके आलोचकों का मानना है कि इससे काम करने की प्रेरणा (Work Disincentive) कम हो सकती है और सरकारी राजकोषीय घाटे पर अत्यधिक दबाव पड़ सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: सार्वभौमिक बुनियादी आय (UBI) एक ऐसा वैचारिक प्रस्ताव है जिसके तहत देश के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी पूर्व शर्त (जैसे रोजगार की स्थिति या आय स्तर) के एक निश्चित आवधिक राशि सीधे हस्तांतरित की जाती है। इसका उद्देश्य रिसाव और प्रशासनिक अक्षमताओं को कम करते हुए न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। कथन 2 गलत है: केंद्रीय आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में UBI पर एक पूरा अध्याय था। इसमें यह सुझाव दिया गया था कि UBI को मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं के 'स्थानापन्न' (Substitute) के रूप में लागू किया जा सकता है, लेकिन सभी सब्सिडी को पूरी तरह समाप्त करने का कोई कठोर या अव्यवहारिक सुझाव नहीं दिया गया था, विशेषकर गरीबों को मिलने वाले आवश्यक समर्थन को ध्यान में रखते हुए। इसके अलावा, सर्वेक्षण ने समाज के सबसे गरीब और कमजोर वर्गों (जैसे महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे) के लिए अर्ध-सार्वभौमिक (Quasi-universal) दृष्टिकोण अपनाने की भी बात कही थी। कथन 3 सही है: UBI के पक्षधरों का मानना है कि यह गरीबी और असमानता से लड़ने का एक प्रभावी साधन है, जो लोगों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है और उनकी मोलभाव करने की क्षमता को बढ़ाता है। वहीं, इसके आलोचकों का तर्क है कि इससे मुफ्तखोरी की संस्कृति को बढ़ावा मिल सकता है, काम करने की प्रेरणा (work disincentive) घट सकती है और भारत जैसे विकासशील देश में इसके लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन जुटाना राजकोषीय दृष्टि से अत्यंत कठिन होगा।
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