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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) और इसके विधिक ढांचे तथा शक्तियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना वर्ष 2010 में 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रभावी और त्वरित प्रवर्तन के लिए की गई थी।
  2. 2. यह अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अंतर्गत निहित सख्त न्यायिक प्रक्रियाओं से बाध्य नहीं है, बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है।
  3. 3. NGT को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त 'स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार' को लागू करने का विशेष अधिकार प्राप्त है, और इसके आदेशों या निर्णयों के विरुद्ध केवल सीधे उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है, जबकि उच्च न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से इसे पूरी तरह से बाहर रखा गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' के तहत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों (जल और वायु प्रदूषण सहित) के संरक्षण से जुड़े मामलों के प्रभावी और तीव्र निपटान के लिए 18 अक्टूबर 2010 को की गई थी। भारत ऐसा करने वाला दुनिया का तीसरा देश (ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बाद) और पहला विकासशील देश बना था। कथन 2 सही है: NGT अधिनियम, 2010 की धारा 19 के अनुसार, अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की प्रक्रियाओं से बाध्य नहीं है, बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) के आधार पर अपने मामलों का संचालन करता है। कथन 3 गलत है: हालांकि NGT के आदेशों या निर्णयों के विरुद्ध 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम' की धारा 22 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में 90 दिनों के भीतर अपील की जा सकती है, किंतु NGT के निर्णयों को उच्च न्यायालयों (High Courts) की 'रिट अधिकारिता' ( अनुच्छेद 226 और 227 के तहत) से पूरी तरह बाहर नहीं किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों (जैसे 'मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' वाद) में यह स्पष्ट किया है कि NGT के आदेशों को उच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती दी जा सकती है, क्योंकि उच्च न्यायालयों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति 'संविधान की मूल संरचना' (Basic Structure) का हिस्सा है।
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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) के विधिक क्षेत्राधिकार, अपीलीय प्रावधानों तथा शक्तियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के तहत NGT को पर्यावरण से जुड़े उन विशिष्ट सिविल मामलों में न्यायनिर्णयन की व्यापक शक्ति प्राप्त है जो अधिनियम की अनुसूची I में सूचीबद्ध सात पर्यावरण कानूनों के प्रवर्तन से संबंधित हैं, किंतु इसके पास 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' के अंतर्गत आने वाले मामलों पर विचार करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। 2. 'सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' और NGT की कार्यप्रणाली से जुड़े अन्य न्यायिक निर्णयों के अनुसार, अधिकरण के पास अपने आदेशों या निर्देशों का पालन न किए जाने पर सिविल अवमानना (Civil Contempt) के साथ-साथ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के तहत भी दंडित करने की वही शक्तियाँ प्राप्त हैं जो देश के उच्च न्यायालयों को होती हैं। 3. 'मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2021)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील सीधे देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी उच्चतम न्यायालय में ही की जा सकती है, और NGT के फैसलों के खिलाफ देश के किसी भी उच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत रिट अधिकारक्षेत्र का प्रयोग पूरी तरह से वर्जित है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 108' के अंतर्गत संसद के 'संयुक्त अधिवेशन' (Joint Sitting) की प्रक्रिया और उसके संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 108 दोनों सदनों के बीच गतिरोध की स्थिति में राष्ट्रपति को संसद के संयुक्त अधिवेशन आहूत करने की शक्ति प्रदान करता है, और यह प्रावधान धन विधेयक (Money Bill) तथा संविधान संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment Bill) दोनों पर समान रूप से लागू होता है। 2. संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) द्वारा की जाती है, और उनकी अनुपस्थिति में लोकसभा के उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) तथा उनकी भी अनुपस्थिति में राज्य सभा के उपसभापति (Deputy Chairman) द्वारा इसकी अध्यक्षता की जाती है; किंतु राज्य सभा के सभापति (Chairman/Vice-President) कभी भी संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता नहीं कर सकते हैं। 3. संयुक्त अधिवेशन में कोई भी नया संशोधन विधेयक में तब तक प्रस्तावित नहीं किया जा सकता है जब तक कि वह विधेयक दोनों सदनों में गतिरोध का मूल कारण न रहा हो, सिवाय उन संशोधनों के जो समय बीतने के कारण आवश्यक हो गए हों। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत किसी राज्य में 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) की घोषणा और उसके प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रपति शासन की घोषणा के पश्चात राज्य विधानसभा को अनिवार्य रूप से तुरंत भंग (Dissolve) कर दिया जाता है, और राज्य का संपूर्ण शासन कार्य सीधे राष्ट्रपति या उसके द्वारा नियुक्त राज्यपाल के हाथों में चला जाता है। 2. संसद द्वारा राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा का अनुमोदन दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तारीख से 'दो महीने' के भीतर साधारण बहुमत (Simple majority) से किया जाना अनिवार्य होता है। 3. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय ने 'एस. आर. बोम्बे मामले' (1994) में यह स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए राष्ट्रपति का समाधान दुर्भावनापूर्ण, अप्रासंगिक आधारों पर आधारित या शक्ति का दुरुपयोग पाए जाने पर न्यायालय द्वारा इस उद्घोषणा को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, भारत में 'विदेशी मुद्रा भंडार' (Foreign Exchange Reserves) और 'पूंजी खाता परिवर्तनीयता' (Capital Account Convertibility) के प्रावधानों तथा उनके प्रबंधन के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 'भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934' के प्रावधानों के अंतर्गत किया जाता है, और इस भंडार में विदेशी मुद्रा संपत्तियाँ (FCAs), स्वर्ण (Gold), विशेष आहरण अधिकार (SDRs), और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास आरक्षित स्थिति (Reserve Tranche) शामिल होती हैं। 2. 'तारापोरे समिति' (Tarapore Committee), जिसने भारत में पूंजी खाता परिवर्तनीयता पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, ने यह संस्तुति की थी कि पूंजी खाता परिवर्तनीयता को पूरी तरह लागू करने से पहले केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना चाहिए और मुद्रास्फीति को एक निश्चित लक्ष्य सीमा के भीतर नियंत्रित किया जाना चाहिए। 3. यद्यपि वर्तमान में भारत में कॉर्पोरेट क्षेत्र और अधिकृत डीलरों के माध्यम से पूंजी खाते पर अनेक प्रकार के लेन-देन (जैसे बाहरी वाणिज्यिक उधार या प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के लिए उच्च स्तर की परिवर्तनीयता उपलब्ध है, किंतु घरेलू व्यक्तियों (Resident Individuals) के लिए पूंजी खाते के लेन-देन पर 'उदारीकृत प्रेषण योजना' (Liberalised Remittance Scheme - LRS) के तहत कोई मौद्रिक या मात्रात्मक सीमा लागू नहीं होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 20' के अंतर्गत 'अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण' (Protection in respect of conviction for offences) के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस अनुच्छेद के तहत किसी भी व्यक्ति को ऐसे किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाएगा जो उस कार्य के किए जाने के समय जो किसी प्रवृत्त विधि (Enforced Law) के अधीन अपराध नहीं था, और न ही उसे उससे अधिक पेनल्टी (Penalty) दी जाएगी जो उस अपराध के किए जाने के समय प्रवृत्त विधि के अधीन दी जा सकती थी। 2. किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित (Double Jeopardy) नहीं किया जा सकता है, और यह संरक्षण केवल न्यायालयों या न्यायिक न्यायाधिकरणों (Judicial Tribunals) के समक्ष की गईवाहियों तक सीमित है, न कि विभागीय या प्रशासनिक प्राधिकरणों के समक्ष। 3. किसी भी अपराध के लिए अभियुक्त किसी भी व्यक्ति को अपने ही विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य (Self-incrimination) नहीं किया जा सकता है, और यह सुरक्षा मौखिक साक्ष्यों के साथ-साथ भौतिक साक्ष्यों जैसे अंगुलियों की छाप (Fingerprints), रक्त के नमूने या हस्ताक्षर के अनिवार्य नमूने देने पर भी समान रूप से लागू होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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