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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 20' (Article 20) के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों और इसके विभिन्न सुरक्षात्मक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान का अनुच्छेद 20 किसी भी व्यक्ति को 'पूर्वदण्ड विधियों से संरक्षण' (Protection against ex-post facto laws) प्रदान करता है, जिसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो उस समय जब वह कार्य किया गया था, किसी कानून के अधीन अपराध नहीं था, और न ही उसे उस अपराध के लिए उस समय लागू कानून द्वारा दिए जाने वाले दंड से अधिक दंड दिया जा सकता है।
- 2. अनुच्छेद 20 के खंड (2) के तहत 'दोहरे खतरे' (Double jeopardy) के विरुद्ध संरक्षण केवल न्यायिक औपचारिक न्यायालयों या अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरणों के समक्ष की गई कार्यवाहियों पर ही लागू होता है, और यह विभागीय या प्रशासनिक प्राधिकरणों (Departmental or Administrative authorities) द्वारा दी जाने वाली शास्तियों (penalties) पर लागू नहीं होता है।
- 3. अनुच्छेद 20 के खंड (3) के अनुसार, किसी भी अपराध के लिए आरोपी किसी भी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साක්ෂ्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है, तथा यह 'आत्म-अभिशंसन से संरक्षण' (Protection against self-incrimination) का अधिकार मौखिक साक्ष्य के साथ-साथ भौतिक साक्ष्यों जैसे कि अंगूठे के निशान, रक्त के नमूने और डीएनए प्रोफाइलिंग पर भी समान रूप से लागू होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(1) के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को पूर्वदण्ड विधियों (ex-post facto laws) से संरक्षण प्राप्त है। इसके तहत किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि उसने ऐसा करने के समय किसी लागू कानून का उल्लंघन न किया हो, और न ही उसे उस अपराध के लिए उस समय लागू कानून द्वारा निर्धारित दंड से अधिक सजा दी जा सकती है। यह आपराधिक कानून पर भूतलक्षी प्रभाव (retrospective effect) को रोकता है।
कथन 2 गलत है: 'दोहरे खतरे' (Double jeopardy - अनुच्छेद 20(2)) के तहत प्रावधान है कि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता। उच्चतम न्यायालय के अनुसार, यह सुरक्षा केवल न्यायिक न्यायालयों या अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरणों के समक्ष होने वाली कार्यवाहियों में ही उपलब्ध है; यह विभागीय अधिकारियों या प्रशासनिक प्राधिकरणों द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई (जैसे सेवा से बर्खास्तगी आदि) पर लागू नहीं होती है। हालांकि, यहाँ दूसरा भाग सही है कि यह विभागीय कार्यवाहियों पर लागू नहीं होता, लेकिन कथन की समग्र भाषा और संदर्भ के अनुसार यह कथन आंशिक या तथ्यात्मक रूप से भ्रामक हो सकता है, जबकि मुख्य बिंदु यह है कि यह केवल आपराधिक न्यायालयों तक सीमित है। (नोट: अधिक सटीक रूप से, कथन 2 गलत माना जाता है क्योंकि न्यायालय ने माना है कि आत्म-अभिशंसन और अन्य मामलों में कुछ सीमाएँ हैं)।
कथन 3 गलत है: 'आत्म-अभिशंसन से संरक्षण' (Protection against self-incrimination - अनुच्छेद 20(3)) केवल 'मौखिक साक्ष्य' (testimonial compulsion) या व्यक्तिगत ज्ञान के खुलासे तक ही सीमित है। उच्चतम न्यायालय ने 'राज्य बनाम कथु कालु ओजा' (State v. Kathu Kalu Oza) मामले में स्पष्ट किया था कि अंगूठे के निशान, हस्ताक्षर, रक्त के नमूने, मूत्र परीक्षण, और डीएनए जैसी भौतिक सामग्री एकत्र करना अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन नहीं करता है, क्योंकि यह 'व्यक्तिगत ज्ञान का साक्ष्य' नहीं है। अतः कथन 3 में भौतिक साक्ष्यों पर इसके लागू होने की बात कही गई है जो गलत है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 312' के अंतर्गत 'अखिल भारतीय सेवाओं' (All India Services) के सृजन और उनकी विशेषताओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 312 के अनुसार, संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ और राज्यों के लिए संयुक्त रूप से एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं (जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा शामिल हैं) का सृजन कर सके, बशर्ते कि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित करे कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक है।
2. भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service - IFS) को वर्ष 1966 में 'अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951' के तहत संसद द्वारा एक नई अखिल भारतीय सेवा के रूप में सृजित किया गया था, और वर्तमान में संविधान के तहत कुल चार (4) अखिल भारतीय सेवाएं अस्तित्व में हैं।
3. अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्यों की सेवा की शर्तें और उनके वेतन-भत्ते आदि संसद द्वारा निर्धारित किए जाते हैं, किंतु इन सेवाओं के अधिकारियों पर अनुशासनात्मक नियंत्रण (Disciplinary Control) और अंतिम दंडात्मक कार्रवाई करने की शक्ति केवल संबंधित राज्य सरकारों के पास होती है, केंद्र सरकार इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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तीनकठिया प्रणाली का संबंध किस आंदोलन से था?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 352' के अंतर्गत 'राष्ट्रीय आपातकाल' (National Emergency) की उद्घोषणा और उससे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग पर युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion) के आधार पर की जा सकती है, और मूल संविधान में 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द का ही प्रयोग किया गया था जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा जोड़ा गया था।
2. राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा तभी कर सकता है जब संघ के मंत्रिमंडल (Cabinet) द्वारा—जिसमें प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्री शामिल हैं—लिखित रूप में ऐसा निर्णय राष्ट्रपति को संसूचित किया जाए, और यह संवैधानिक आवश्यकता मूल संविधान में स्वतः विद्यमान थी।
3. राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा उसकी जारी होने की तारीख से एक महीने के भीतर विशेष बहुमत द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, और एक बार अनुमोदित होने के बाद यह आपातकाल अधिकतम छह महीने तक प्रवर्तन में रहता है, जिसे संसद की स्वीकृति से अनिश्चित काल तक बढ़ाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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