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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 124' के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, collegium प्रणाली' और 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम, 2014' के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के मूल पाठ में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 'कॉलेजियम प्रणाली' का कोई प्रत्यक्ष प्रावधान नहीं था, और इसे वर्ष 1993 के 'द्वितीय न्यायाधीश मामले (Second Judges Case)' में उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने न्यायिक निर्णय के माध्यम से स्थापित किया गया था।
  2. 2. संसद द्वारा संविधान (निन्यानवेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2014 और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम पारित करके उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली को समाप्त कर एक सांविधिक निकाय के रूप में NJAC की स्थापना की गई थी।
  3. 3. 'सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015)' के ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने NJAC अधिनियम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) का उल्लंघन करने वाला मानते हुए इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: मूल संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश से परामर्श का प्रावधान था। 'कॉलेजियम प्रणाली' का विकास न्यायिक निर्णयों (विशेषकर 1993 के द्वितीय न्यायाधीश मामले) के माध्यम से हुआ। कथन 2 गलत है: NJAC अधिनियम के माध्यम से NJAC को एक 'संवैधानिक निकाय' (Constitutional Body - 99वें संविधान संशोधन के तहत) बनाने का प्रयास किया गया था, न कि केवल एक 'सांविधिक निकाय' (Statutory Body) के रूप में। कथन 3 सही है: वर्ष 2015 के 'चौथे न्यायाधीश मामले' (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ) में उच्चतम न्यायालय ने 99वें संविधान संशोधन और NJAC अधिनियम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता (जो कि संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा है) के विरुद्ध मानते हुए शून्य और असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिससे पुनः कॉलेजियम प्रणाली बहाल हो गई।
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