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सामान्य विज्ञान और पर्यावरण के संदर्भ में, 'ओजोन परत का क्षरण' (Ozone Layer Depletion) और 'ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल' (Polar Stratospheric Clouds - PSCs) के बीच की अंतःक्रिया तथा इसके प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल (PSCs) सर्दियों के मौसम में ध्रुवीय क्षेत्रों (विशेषकर अंटार्कटिका के ऊपर) के समतापमंडल में बनते हैं, और ये बादल सतह प्रदान करते हैं जिस पर निष्क्रिय क्लोरीन यौगिक सक्रिय क्लोरीन (जैसे Cl2) में परिवर्तित हो जाते हैं।
- 2. वसंत ऋतु के आगमन पर जब सूर्य की किरणें ध्रुवीय क्षेत्रों में पहुंचती हैं, तो पराबैंगनी विकिरण इन सक्रिय क्लोरीन अणुओं को क्लोरीन मूलकों (Chlorine radicals) में विघटित कर देते हैं, जो ओजोन अणुओं के विनाश की उत्प्रेरक श्रृंखला (Catalytic chain reaction) को शुरू करते हैं।
- 3. यद्यपि क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) ओजोन क्षरण के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं, किंतु समतापमंडल में ओजोन परत के पूर्ण संरक्षण के लिए 'मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल' (Montreal Protocol) मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के वैश्विक उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए बाध्यकारी समझौता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल (PSCs) सर्दियों के दौरान समतापमंडल में अत्यधिक निम्न तापमान (-78°C से कम) पर बनते हैं। ये बादल विषम (Heterogeneous) रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए एक सतह प्रदान करते हैं, जो स्थिर और निष्क्रिय क्लोरीन जलाशयों (जैसे HCl और ClONO2) को सक्रिय क्लोरीन यौगिकों में बदल देते हैं।
कथन 2 सही है: जब वसंत ऋतु में सूर्य का प्रकाश ध्रुवीय क्षेत्रों में वापस लौटता है, तो पराबैंगनी (UV) किरणें इन सक्रिय क्लोरीन अणुओं को तेजी से क्लोरीन मूलकों (Cl•) में तोड़ देती हैं। एक अकेला क्लोरीन मूलक श्रृंखला प्रतिक्रिया के माध्यम से हजारों ओजोन (O3) अणुओं को ऑक्सीजन में परिवर्तित कर सकता है।
कथन 3 गलत है: 'मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल' (1987) मुख्य रूप से ओजोन परत का क्षरण करने वाले पदार्थों (ODSs) जैसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हैलोन और कार्बन टेट्राक्लोराइड के उत्पादन और उपभोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने से संबंधित है, न कि ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के नियंत्रण से (ग्रीनहाउस गैसों के लिए क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता हैं)। अतः कथन 3 गलत है।
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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) के विधिक क्षेत्राधिकार, अपीलीय प्रावधानों तथा शक्तियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के तहत NGT को पर्यावरण से जुड़े उन विशिष्ट सिविल मामलों में न्यायनिर्णयन की व्यापक शक्ति प्राप्त है जो अधिनियम की अनुसूची I में सूचीबद्ध सात पर्यावरण कानूनों के प्रवर्तन से संबंधित हैं, किंतु इसके पास 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' के अंतर्गत आने वाले मामलों पर विचार करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
2. 'सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' और NGT की कार्यप्रणाली से जुड़े अन्य न्यायिक निर्णयों के अनुसार, अधिकरण के पास अपने आदेशों या निर्देशों का पालन न किए जाने पर सिविल अवमानना (Civil Contempt) के साथ-साथ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के तहत भी दंडित करने की वही शक्तियाँ प्राप्त हैं जो देश के उच्च न्यायालयों को होती हैं।
3. 'मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2021)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी भी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील सीधे देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी उच्चतम न्यायालय में ही की जा सकती है, और NGT के फैसलों के खिलाफ देश के किसी भी उच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत रिट अधिकारक्षेत्र का प्रयोग पूरी तरह से वर्जित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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2. अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन (President's Rule) की घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तारीख से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, और यदि इसे एक बार अनुमोदित कर दिया जाता है, तो यह अधिकतम तीन वर्षों की अवधि तक लागू रह सकता है, जिसके लिए प्रत्येक छह महीने पर संसद की पुनः स्वीकृति आवश्यक होती है, बशर्ते इस अवधि के दौरान राष्ट्रीय आपातकाल लागू न हो।
3. 'एस.आर. बोम्बाई बनाम भारत संघ (1994)' के ऐतिहासिक मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की गई घोषणा न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है और इसके लिए संसद या न्यायालय द्वारा कोई जाँच नहीं की जा सकती है।
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