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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 123' के अंतर्गत 'राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति' (Ordinance-making Power) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रपति किसी अध्यादेश को केवल तभी प्रख्यापित कर सकता है जब संसद के दोनों सदन सत्र में नहीं होते हैं, और राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है।
- 2. अध्यादेश जारी करने की राष्ट्रपति की शक्ति संसद की विधि बनाने की शक्ति के समान व्यापक होती है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति उन सभी विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिन पर संसद कानून बना सकती है, और इसके तहत संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन भी किया जा सकता है।
- 3. संसद के पुनः समवेत होने पर प्रत्येक अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना अनिवार्य होता है, और यदि संसद के पुनर्गठन के बाद दोनों सदनों द्वारा इसे अस्वीकार करने वाला संकल्प पारित कर दिया जाता है, तो यह अध्यादेश संसद द्वारा अनुमोदन न मिलने पर तुरंत निष्प्रभावी हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: राष्ट्रपति अनुच्छेद 123 के तहत केवल तभी अध्यादेश जारी कर सकता है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों या उनमें से कोई एक सत्र में न हो, और उसे ऐसी त्वरित परिस्थितियों का आभास हो जिनके कारण तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो।
कथन 2 गलत है: यद्यपि अध्यादेश की विषय-वस्तु संसद की कानून बनाने की शक्ति तक ही सीमित होती है, किंतु राष्ट्रपति अध्यादेश के माध्यम से 'संविधान संशोधन' (Constitutional Amendment) नहीं कर सकता है। संविधान संशोधन केवल अनुच्छेद 368 के तहत निर्धारित विशेष प्रक्रिया और संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग पारित किए जाने के माध्यम से ही किया जा सकता है।
कथन 3 सही है: संसद के पुनः समवेत होने पर अध्यादेश को दोनों सदनों के समक्ष रखना अनिवार्य होता है। यदि दोनों सदन इसे अस्वीकार करने का संकल्प पारित कर देते हैं या छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने से पहले यह स्वीकृत नहीं होता है, तो अध्यादेश निष्प्रभावी हो जाता है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन (President's Rule) तथा उससे संबंधित न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति शासन की घोषणा के संबंध में 'एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामले में उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति द्वारा राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल होने की घोषणा न्यायिक पुनरावलोकन के दायरे से पूरी तरह बाहर है, क्योंकि यह पूरी तरह से कार्यपालिका की संप्रभु और राजनीतिक संतुष्टि का विषय है।
2. अनुच्छेद 356 के तहत संसद के दोनों सदनों द्वारा राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा का अनुमोदन दो माह के भीतर सामान्य बहुमत (Simple Majority) से किया जाना अनिवार्य है, तथा एक बार अनुमोदित होने के बाद यह अधिकतम तीन वर्ष तक जारी रह सकता है, बशर्ते हर छह महीने पर इसका पुनरनुमोदन किया जाए और इस अवधि के दौरान अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो या निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित करे कि राज्य में तत्काल चुनाव कराना संभव नहीं है।
3. 'एस. आर. बोम्मई मामले' में यह भी निर्धारित किया गया था कि यदि राष्ट्रपति द्वारा की गई राज्य विधानसभा की विघटन या निलंबन की घोषणा को न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित कर दिया जाता है, तो न्यायालय के पास यह शक्ति है कि वह भंग की गई विधानसभा को पुनर्जीवित कर सकता है और सरकार को बहाल कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 200' और 'अनुच्छेद 201' के अंतर्गत राज्य के राज्यपाल की विधイਕ शक्तियों (Legislative Powers regarding Bills) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत जब राज्य विधानमंडल द्वारा कोई विधेयक पारित कर राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल के पास यह शक्ति होती है कि वह विधेयक को अपनी अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, अथवा विधेयक (धन विधेयक को छोड़कर) को राज्य विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
2. यदि राज्य विधानमंडल किसी विधेयक को संशोधन के साथ या उसके बिना दोबारा पारित कर देता है और उसे फिर से राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत करता है, तो राज्यपाल के लिए उस विधेयक पर अपनी अनुमति देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाता है, और वह उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित नहीं कर सकता है।
3. राज्यपाल किसी राज्य विधानमंडल द्वारा पारित ऐसे किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित (Reserve) कर सकता है, जो उच्च न्यायालय की शक्तियों को इस प्रकार से कम करता है कि जिससे संविधान द्वारा उच्च न्यायालय कोप्रदत्त स्थिति का उल्लंघन होता हो, और ऐसे मामलों में राष्ट्रपति के लिए उस विधेयक पर अपनी अनुमति देना अनिवार्य नहीं होता है।
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