BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Civil services
15 views

भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 76' के अंतर्गत भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और 'अनुच्छेद 165' के अंतर्गत महाधिवक्ता (Advocate General) के पदों एवं उनके अधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. महान्यायवादी भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित (Qualified) हो, और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) अपने पद पर बना रहता है।
  2. 2. भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे संसद की किसी भी समिति की कार्यवाही में मतदान देने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
  3. 3. राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, और इसके लिए यह आवश्यक है कि वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने की योग्यता रखता हो, तथा अपने पद पर रहते हुए वह निजी वकालत (Private practice) से पूरी तरह वंचित होता है और किसी भी आपराधिक मामले में राज्य सरकार के विरुद्ध पैरवी नहीं कर सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार, राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित है, भारत का महान्यायवादी (Attorney General) नियुक्त करता है। वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। कथन 2 सही है: महान्यायवादी को भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 88 के तहत उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी किसी भी समिति में—जिसमें उसका नाम सदस्य के रूप में जोड़ा जाए—बोलने और भाग लेने का अधिकार है, किंतु उसे मत देने (Voting) का कोई अधिकार नहीं है। कथन 3 गलत है: राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 165 के तहत यह प्रावधान है कि उसे उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता रखनी चाहिए। हालांकि, महान्यायवादी और महाधिवक्ता दोनों ही सरकारी कर्मचारी या पूर्णकालिक वकील (Full-time counsel) नहीं होते हैं; वे निजी वकालत (Private practice) करने से प्रतिबंधित नहीं होते हैं, बशर्ते कि वे सरकार के खिलाफ किसी मामले में पेश न हों।
Share:

Related Questions

→ सर्वोच्च न्यायालय से राष्ट्रपति द्वारा 'परामर्श' लेने की शक्ति किस अनुच्छेद में वर्णित है? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 105' के अंतर्गत संसद सदस्यों के 'संसदीय विशेषाधिकारों' (Parliamentary Privileges) और 'अनुच्छेद 194' के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के सदस्यों के विशेषाधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुसार संसद में या उसकी किसी समिति में संसद सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में किसी भी न्यायालय में उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती, और यह उन्मुक्ति (Immunity) संसद के सदस्यों के साथ-साथ उन व्यक्तियों को भी प्राप्त है जो संसद की कार्यवाही या उसके किसी सदन के प्राधिकार से किसी रिपोर्ट, पत्र, वोटों या विवरण को प्रकाशित करते हैं। 2. यदि संसद का कोई सदन अपने किसी विशेषाधिकार के हनन या सदन की अवमानना (Breach of Privilege or Contempt of House) के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करता है या सदन के समक्ष हाजिर होने का आदेश देता है, तो न्यायालयों को इस बात की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार है कि सदन द्वारा अपनी विशेषाधिकार शक्ति का प्रयोग किस प्रक्रिया के तहत किया गया है, और न्यायालय विशेषाधिकार के दायरे को तय कर सकता है। 3. जब तक संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध (Codify) करने के लिए कोई विशेष कानून नहीं बनाया जाता है, तब तक भारत के प्रत्येक सदन और उसके सदस्यों व समितियों के विशेषाधिकार वही माने जाएंगे जो 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के ठीक पहले यूनाइटेड किंगडम की 'हाउस ऑफ कॉमन्स' (House of Commons) के पास थे। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार किसी राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिस पर राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलಂಬन (Reprieve), विराम (Respite) या परिहार (Remission) करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या commutation करने की शक्ति प्राप्त है। 2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'श्रीकांत चंद्रकांत चिपलुकर बनाम महाराष्ट्र राज्य' तथा अन्य ऐतिहासिक मामलों में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का दायरा अत्यंत सीमित है, और राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह (Aid and Advice) के बिना अपनी स्वतंत्र इच्छा से किसी भी आजीवन कारावास के कैदी की सजा को माफ कर सकते हैं। 3. 'राज्य सरकार बनाम एम.पी. प्रीतम सिंह' और 'मैरी विमला बनाम सुंदराथन' जैसे मामलों में न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि यदि किसी अपराधी को भारतीय दंड संहिता (IPC) के अंतर्गत मृत्युदंड (Death Sentence) की सजा सुनाई गई है, तो ऐसी स्थिति में भी राज्य का राज्यपाल उस मृत्युदंड को क्षमा या commute कर सकता है, क्योंकि राज्यपाल की यह शक्ति राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72) के बिल्कुल समकक्ष होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' (पंचायती राज - अनुच्छेद 243 से 243-O) तथा 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों के प्रशासनिक नियंत्रण के लिए कुल 29 कार्यात्मक विषयों को सूचबद्ध किया गया है, और इन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति अनन्य रूप से राज्य के विधानमंडल को प्रदान की गई है। 2. संविधान के अनुच्छेद 243-G के अंतर्गत पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करने तथा उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, किंतु इन योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए कर, शुल्क, और टोल (Tolls) लगाने की वित्तीय शक्तियां देना अनिवार्य (Mandatory) नहीं बल्कि राज्य विधानमंडल के विवेक पर निर्भर है। 3. संविधान के अनुच्छेद 243-I के अनुसार प्रत्येक राज्य के राज्यपाल द्वारा हर पांच वर्ष की समाप्ति पर एक 'वित्त आयोग' (Finance Commission) का गठन किया जाएगा, जो राज्य और पंचायतों के बीच करों, शुल्कों और फीसों के विभाजन के सिद्धांतों की संप्रभुता के साथ अंतिम रूप से समीक्षा करता है और इसके द्वारा की गई सिफारिशें राज्य सरकार के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी (Binding) होती हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → e-Sushrut@Clinic प्लेटफ़ॉर्म किस से संबंधित है?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.