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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (Directive Principles of State Policy - DPSP) के वर्गीकरण और उनके प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान निर्माताओं ने नीति निर्देशक तत्वों को उनके वैचारिक स्रोतों और उद्देश्यों के आधार पर स्पष्ट रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया था—समाजवादी (Socialist), गांधीवादी (Gandhian) और उदार-बौद्धिक (Liberal-Intellectual), और ये सभी सिद्धांत मूल संविधान के अनुच्छेद 36 से 51 के अंतर्गत समाहित हैं।
  2. 2. यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मौलिक हैं और देश के विधायी तथा कार्यकारी अंगों का यह कर्तव्य है कि वे कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें, तथापि इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं बनाया गया है, जिसका अर्थ है कि इनके उल्लंघन पर किसी भी व्यक्ति द्वारा सीधे सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय की शरण नहीं ली जा सकती है।
  3. 3. केशवानंद भारती वाद (1973) के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है कि नीति निर्देशक तत्व और मौलिक अधिकार एक-दूसरे के विरोधी हैं, और यदि किसी सामाजिक-आर्थिक कल्याणकारी कानून को लागू करने के दौरान मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों में प्रत्यक्ष टकराव होता है, तो हमेशा मौलिक अधिकारों को ही प्राथमिकता दी जाएगी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि यद्यपि नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) को व्यापक रूप से समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक विचारधाराओं में वर्गीकृत किया जाता है, परंतु भारतीय संविधान के मूल पाठ (Article 36-51) में इन्हें आधिकारिक या स्पष्ट रूप से इन तीन श्रेणियों में विभाजित नहीं किया गया है; यह वर्गीकरण केवल राजनीतिक और कानूनी विद्वानों द्वारा उनकी प्रकृति को समझने के लिए किया गया है। कथन 2 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार DPSP देश के शासन में मौलिक हैं, लेकिन वे गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं, यानी उनके क्रियान्वयन के लिए न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं कराया जा सकता। कथन 3 गलत है क्योंकि मिनर्वा मिल्स वाद (1980) सहित कई अन्य मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं (Harmonious balance between Part III and Part IV), और वे एक ही रथ के दो पहियों के समान हैं। अदालत ने यह भी माना है कि कुछ मामलों में (विशेषकर अनुच्छेद 39(b) और (c) के तहत आने वाले सामाजिक-आर्थिक न्याय के मामलों में) नीति निर्देशक तत्वों को मौलिक अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 14 और 19) पर प्राथमिकता दी जा सकती है।
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