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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता के संदर्भ में, 'क्लाइमेट एंड क्लीन एयर कोएलिशन' (CCAC) और इसके लक्ष्यों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. क्लाइमेट एंड क्लीन एयर कोएलिशन (CCAC) सरकारों, अंतर-सरकारी संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों की एक स्वैच्छिक साझेदारी है, जिसे वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों (Short-Lived Climate Pollutants - SLCPs) को कम करने के लिए विशेष रूप से लॉन्च किया गया था।
  2. 2. ब्लैक कार्बन, मीथेन, ट्रोपोस्फेरिक ओजोन और हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) को 'अल्पकालिक जलवायु प्रदूषक' माना जाता है, क्योंकि इनका वायुमंडल में जीवनकाल कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की तुलना में बहुत कम होता है, किंतु इनका ग्लोबल वार्मिंग पर तात्कालिक प्रभाव और ग्रीनहाउस गैसों की तुलना में तापीय क्षमता (GWP) अत्यधिक तीव्र होती है।
  3. 3. भारत इस वैश्विक गठबंधन (CCAC) का एक संस्थापक सदस्य देश है, जिसने वर्ष 2012 में इसके गठन के समय ही इसके शासी बोर्ड में शामिल होकर कृषि, परिवहन और अपशिष्ट प्रबंधन क्षेत्रों में ब्लैक कार्बन और मीथेन उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता व्यक्त की थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: क्लाइमेट एंड क्लीन एयर कोएलिशन (CCAC) की स्थापना वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और छह देशों (बांग्लादेश, कनाडा, घाना, मैक्सिको, स्वीडन और संयुक्त राज्य अमेरिका) द्वारा मिलकर की गई थी। यह अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों (SLCPs) को कम करने वाला एकमात्र वैश्विक प्रयास है। कथन 2 सही है: अल्पकालिक जलवायु प्रदूषक (SLCPs) जैसे ब्लैक कार्बन (काली कार्बन), मीथेन, ट्रोपोस्फेरिक (क्षोभमंडलीय) ओजोन और हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) वायुमंडल में कुछ दिनों से लेकर कुछ वर्षों तक ही टिकते हैं, लेकिन इनका जलवायु पर तात्कालिक और विनाशकारी वार्मिंग प्रभाव पड़ता है क्योंकि इनकी ग्लोबल वार्मिंग क्षमता (GWP) CO2 से कई गुना अधिक होती है। कथन 3 गलत है: भारत इस गठबंधन (CCAC) का संस्थापक सदस्य नहीं है। भारत आधिकारिक तौर पर काफी समय बाद वर्ष 2019 में इस गठबंधन में शामिल हुआ था। अतः कथन 3 असत्य है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, 'संसद के विशेषाधिकार' (Parliamentary Privileges - अनुच्छेद 105 और 194) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद के दोनों सदनों, उसके सदस्यों और समितियों को कुछ विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ प्रदान की गई हैं, और ये विशेषाधिकार केवल तभी उपलब्ध होते हैं जब संसद सत्र में हो या विधाई कार्य चल रहा हो; सत्र के सत्रावसान या विघटन के दौरान ये स्वतः समाप्त हो जाते हैं। 2. 'संसदीय विशेषाधिकारों' के अंतर्गत प्रत्येक सदन को यह अनन्य अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी कार्यवाही के प्रकाशन को रोक सकता है और सदन के सदस्यों या बाहरी व्यक्तियों द्वारा विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) या सदन की अवमानना (Contempt of the House) के लिए उन्हें दंडित या भर्त्सना कर सकता है। 3. यद्यपि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105(3) में यह प्रावधान किया गया है कि जब तक संसद विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध (Codify) नहीं करती है, तब तक इसके विशेषाधिकार वही माने जाएंगे जो ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के पास संविधान लागू होने के समय (26 जनवरी 1950 को) थे, तथापि आज तक भारतीय संसद द्वारा इन विशेषाधिकारों को पूरी तरह से संहिताबद्ध करने के लिए कोई व्यापक कानून नहीं बनाया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संसद के 'विशेषाधिकार प्रस्ताव' (Privilege Motion) तथा संसद सदस्यों के विशेषाधिकारों के हनन (Breach of Privilege) की प्रक्रिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. विशेषाधिकार प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन के किसी भी सदस्य द्वारा उस मंत्री या सदस्य के विरुद्ध लाया जा सकता है जिस पर यह आरोप हो कि उसने सदन या उसके किसी सदस्य के किसी विशेषाधिकार का हनन किया है या सदन के समक्ष तथ्यात्मक रूप से गलत या झूठे तथ्य प्रस्तुत करके सदन की अवमानना (Contempt of the House) की है। 2. लोकसभा में विशेषाधिकार प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए संबंधित सदस्य को बैठक शुरू होने से पहले सुबह निर्धारित समय तक अध्यक्ष को लिखित सूचना देनी होती है, और इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए सदन के कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन (लिखित या मौखिक) की अनिवार्य आवश्यकता होती है। 3. यदि लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति द्वारा किसी विशेषाधिकार प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है, तो मामले को या तो सीधे सदन की 'विशेषाधिकार समिति' (Privilege Committee) को जांच के लिए भेज दिया जाता है या सदन स्वयं इस पर बहस करके निर्णय ले सकता है, और इस समिति की रिपोर्ट पर विचार करते समय यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी सदस्य या मंत्री को अपना पक्ष रखने का कोई अवसर दिया जाए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, भारत के 'राष्ट्रीय उद्यान' (National Parks) और 'वन्यजीव अभ्यारण्यों' (Wildlife Sanctuaries) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत किसी क्षेत्र को 'राष्ट्रीय उद्यान' के रूप में अधिसूचित करने की शक्ति केवल राज्य सरकार के पास है, जबकि 'वन्यजीव अभ्यारण्य' के मामले में राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी राजपत्र (Gazette) में अधिसूचना जारी करने का अंतिम अधिकार प्राप्त है। 2. राष्ट्रीय उद्यानों में मानवीय गतिविधियों, जैसे कि मवेशी चराना, निजी स्वामित्व के अधिकार (Private ownership rights) और वानिकी उत्पादों का संग्रहण, को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाता है और किसी भी स्थिति में इनकी अनुमति नहीं दी जाती है, जबकि वन्यजीव अभ्यारण्यों में मुख्य वन्यजीव वार्डन (Chief Wildlife Warden) की अनुमति से कुछ सीमित मानवीय गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है। 3. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की मूल संरचना के तहत, राष्ट्रीय उद्यानों की सीमाओं में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए राज्य सरकार को अनिवार्य रूप से भारतीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife - NBW) की पूर्व अनुशंसा या अनुमोदन प्राप्त करना होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329A) के अंतर्गत 'भारत के निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार संसद, राज्य legislatures (विधानमंडलों), राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य ऐसे आयुक्त शामिल होते हैं, जिनकी संख्या समय-समय पर राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है। 2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है। 3. संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत संसद या राज्य विधानमंडल के सदनों के लिए चुनावों से संबंधित किसी भी कानून की वैधता पर किसी भी न्यायालय में प्रश्न उठाया जा सकता है, और चुनावी मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला कोई भी संवैधानिक प्रावधान नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत 'रिट अधिकारिता' (Writ Jurisdiction) और इसके विभिन्न प्रकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मौलिक अधिकार है, जिसके तहत उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और इस अधिकारिता का विस्तार केवल सार्वजनिक प्राधिकरणों तक सीमित है, यह किसी भी निजी व्यक्ति या निकाय के विरुद्ध जारी नहीं किया जा सकता है। 2. 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) रिट का शाब्दिक अर्थ 'को शरीर को प्रस्तुत किया जाए' है, जो कि अवैध हिरासत के विरुद्ध एक शक्तिशाली उपाय है, तथा यह रिट सार्वजनिक प्राधिकरणों के साथ-साथ निजी व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा की गई गैर-कानूनी नजरबंदी या गिरफ्तारी के खिलाफ भी जारी की जा सकती है। 3. 'अधिकार-पृच्छा' (Quo-Warranto) रिट किसी सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति के अवैध रूप से आसीन होने को रोकने के लिए जारी की जाती है, और इस रिट को दायर करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि याचिकाकर्ता स्वयं उस पद का दावेदार हो या उसके किसी मौलिक अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन हुआ हो, बल्कि इसे अदालत की अनुमति से किसी भी लोक-हितैषी व्यक्ति (Public-spirited person) द्वारा दायर किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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