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भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति के संदर्भ में, प्राचीन भारत की वास्तुकला, विशेष रूप से 'नागर' (Nagara), 'द्रविड़' (Dravida) और 'बेसर' (Vesara) शैली की मंदिर वास्तुकला से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. नागर शैली के मंदिरों में आमतौर पर आयताकार या वर्गाकार भू-विन्यास (Ground Plan) होता है, जिसमें प्रवेश द्वार पर गोपुरम (Gopuram) नामक विशाल आलंकारिक द्वार और परिसर के भीतर विशाल जलकुंड का होना इसकी प्रमुख और अनिवार्य विशेषताएं हैं।
- 2. द्रविड़ शैली के मंदिरों की सबसे विशिष्ट पहचान उनका वक्ररेखीय शिखर (Curvilinear Tower या Shikhara) होता है, जिसके शीर्ष पर एक गोलाकार 'आमलक' और उसके ऊपर 'कलश' रखा होता है, तथा इसके गर्भगृह के सामने 'मंडप' और 'महामंडप' का निर्माण किया जाता है।
- 3. बेसर शैली, जिसे 'दक्कन शैली' या 'चालुक्य शैली' भी कहा जाता है, नागर और द्रविड़ शैलियों का एक संकर रूप (Hybrid style) है, जिसमें उत्तर भारत के वक्ररेखीय शिखरों और दक्षिण भारत की मंडप योजनाओं तथा मूर्तिकला के तत्वों का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है: 'गोपुरम' (विशाल आलंकारिक प्रवेश द्वार) और मंदिर परिसर के भीतर विशाल जलकुंड द्रविड़ शैली (दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला) की प्रमुख विशेषताएं हैं, न कि नागर शैली की। नागर शैली (उत्तर भारतीय वास्तुकला) में आमतौर पर गोपुरम नहीं होते हैं, बल्कि प्रवेश द्वार अपेक्षाकृत सादे होते हैं।
कथन 2 असत्य है: वक्ररेखीय शिखर (Curvilinear Tower या Shikhara) जिसके शीर्ष पर आमलक और कलश होता है, 'नागर शैली' की प्रमुख विशेषता है, न कि द्रविड़ शैली की। द्रविड़ शैली के मंदिरों में शिखरों के स्थान पर पिरामिडनुमा 'विमान' होते हैं, जो कई मंजिला (Tala) होते हैं और जिनके शीर्ष पर स्तूपिका या अष्टकोणीय 'शिखर' (गुंबद जैसी संरचना) होता है।
कथन 3 सत्य है: बेसर शैली (जिसे चालुक्य या दक्कन शैली भी कहा जाता है) नागर और द्रविड़ शैलियों का सम्मिश्रण (Hybrid) है। इस शैली के मंदिरों में नागर शैली के वक्ररेखीय शिखरों और द्रविड़ शैली के मंडप तथा स्तंभों की सजावट के मिले-जुले रूप दिखाई देते हैं। इस शैली का विकास मुख्य रूप से बादामी के चालुक्य, राष्ट्रकूट और होयसल शासकों के संरक्षण में हुआ था।
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'महासागरीय धाराओं' (Ocean Currents) और उनके निर्माण तथा जलवायु पर पड़ने वाले प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महासागरीय धाराएँ महासागरीय जल का एक निश्चित दिशा में बड़े पैमाने पर सतत प्रवाह है, जो पृथ्वी के घूर्णन (Coriolis Force), प्रचलित हवाओं (Prevailing Winds), तापमान और लवणता में भिन्नता तथा महाद्वीपीय तटरेखाओं के आकार से प्रभावित होती हैं।
2. उत्तरी गोलार्ध में कोरिऑलिस बल के प्रभाव से महासागरीय धाराएँ अपनी मूल दिशा से दाईं ओर (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर (Anti-clockwise) विक्षेपित हो जाती हैं, जो ग्याइरस (Gyres) के निर्माण के लिए उत्तरदायी है।
3. ठंडी महासागरीय धाराएँ उन क्षेत्रों में वर्षा में वृद्धि करती हैं जहाँ से वे गुजरती हैं, क्योंकि ठंडा जल वाष्पीकरण को अत्यधिक बढ़ावा देता है, जिसके परिणामस्वरूप तटीय क्षेत्रों में घने जंगलों और उष्णकटिबंधीय मरुस्थलों का निर्माण होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 355' तथा 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत केंद्र की बाध्यताओं और राष्ट्रपति शासन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 355 केंद्र सरकार पर यह संवैधानिक कर्तव्य आरोपित करता है कि वह बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे तथा यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार ही चलाई जा रही है।
2. 'एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 355 के अंतर्गत आंतरिक अशांति या संवैधानिक तंत्र की विफलता के आधार पर किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति का प्रयोग करने से पूर्व केंद्र सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह राज्य सरकार को पहले एक औपचारिक चेतावनी जारी करे और उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दे, सिवाय उन अत्यधिक असाधारण मामलों के जहाँ तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो।
3. अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा के पश्चात संसद के दोनों सदनों द्वारा इसका अनुमोदन दो महीने के भीतर साधारण बहुमत के बजाय केवल विशेष बहुमत (अर्थात उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत) से ही किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण कानून और 'केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' (CPCB) के गठन, क्षेत्राधिकार एवं कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की स्थापना जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के प्रावधानों के अंतर्गत एक सांविधिक (Statutory) निकाय के रूप में की गई थी, जिसे बाद में वायु (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत भी शक्तियाँ और कार्य सौंपे गए।
2. CPCB देश में राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (National Ambient Air Quality Standards - NAAQS) को अधिसूचित करने और जल निकायों की गुणवत्ता के मानदंडों को निर्धारित करने के लिए वैधानिक रूप से अधिकृत है, और यह केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण से जुड़े मामलों पर तकनीकी सलाह भी देता है।
3. जल अधिनियम, 1974 के अंतर्गत CPCB के पास यह पूर्ण और अंतिम शक्ति है कि वह देश के किसी भी राज्य में स्थित औद्योगिक इकाइयों को बिना किसी पूर्व चेतावनी या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) के परामर्श के सीधे तौर पर बंद करने या उनकी बिजली-पानी की आपूर्ति हमेशा के लिए काटने का प्रत्यक्ष आदेश जारी कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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सामान्य विज्ञान एवं पर्यावरण के संदर्भ में, 'प्रवाल भित्तियाँ' (Coral Reefs) और उनके विरंजन (Coral Bleaching) तथा इससे जुड़ी पारिस्थितिकीय प्रक्रियाओं के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रवाल (Corals) मुख्य रूप से समुद्री जीव हैं जो फाइलम 'सिनेडेरिया' (Cnidaria) से संबंधित हैं, और रीफ-निर्माण करने वाले (Hermatypic) प्रवालों के ऊतकों में 'जूजैन्थेली' (Zooxanthellae) नामक सूक्ष्म शैवाल सहजीवी रूप से निवास करते हैं, जो प्रवालों को उनका विशिष्ट रंग प्रदान करने के साथ-साथ उनके कुल पोषण का अधिकांश हिस्सा प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से प्रदान करते हैं।
2. जब महासागरीय जल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है या समुद्र में अम्लीकरण (Ocean Acidification) की समस्या बढ़ती है, तो प्रवाल तनावग्रस्त होकर अपने ऊतकों में रहने वाले जूजैन्थेली शैवाल को निष्कासित कर देते हैं, जिससे प्रवालों का रंग सफेद हो जाता है और इस स्थिति को प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) कहा जाता है, तथा यदि यह तनाव लंबे समय तक रहे तो प्रवाल की मृत्यु भी हो सकती है।
3. 'अल नीनो' (El Niño) दक्षिणी दोलन की घटना का प्रवाल विरंजन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, क्योंकि अल नीनो केवल वायुमंडलीय परिसंचरण और मानसूनी वर्षा को प्रभावित करता है, जबकि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और प्रवाल स्वास्थ्य पूरी तरह से स्थानीय प्रदूषण और लवणता के स्तर पर निर्भर करते हैं।
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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) की विधिक संरचना तथा शक्तियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई है, और यह भारत का एकमात्र ऐसा विशेष न्यायिक निकाय है जिसे पर्यावरण से जुड़े मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के सख्त नियमों का पालन करने से छूट प्राप्त है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) के आधार पर कार्य करता है।
2. NGT को पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन या प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय क्षति से जुड़े मामलों में आदेश, निर्देश या निर्णय देने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, किंतु यह अधिकरण संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारक्षेत्र की तरह स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की विधिक शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है, जब तक कि कोई औपचारिक याचिका या आवेदन न दायर किया जाए।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील सीधे उच्चतम न्यायालय में ही की जा सकती है, और अधिकरण के निर्णय के खिलाफ किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय में अपील करने का कोई प्रावधान इस अधिनियम के तहत नहीं किया गया है।
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