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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'सार्वजनिक ऋण प्रबंधन' (Public Debt Management) तथा 'राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003' के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. FRBM अधिनियम, 2003 के मूल प्रावधानों के तहत केंद्र सरकार के लिए यह वैधानिक रूप से अनिवार्य किया गया था कि वह वर्ष 2009-03 (संशोधित लक्ष्य) तक राजस्व घाटे को पूरी तरह से समाप्त कर दे और राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3 प्रतिशत तक सीमित रखे।
- 2. FRBM अधिनियम में वर्ष 2018 के संशोधनों के बाद यह लक्ष्य निर्धारित किया गया कि केंद्र सरकार वर्ष 2024-25 तक अपने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.5 प्रतिशत तक लाने का प्रयास करेगी और केंद्र सरकार के कुल ऋण तथा ऋण भार (Debt-to-GDP Ratio) को वर्ष 2024-25 तक क्रमशः 40 प्रतिशत तक सीमित किया जाएगा।
- 3. भारत में केंद्र सरकार के आंतरिक और बाह्य ऋणों का प्रबंधन तथा सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) का निर्गमन वर्तमान में 'भारतीय रिजर्व बैंक' (RBI) द्वारा किया जाता है, किंतु वर्ष 2018 में स्थापित 'सार्वजनिक ऋण प्रबंधन प्रकोष्ठ' (PDMC) को धीरे-धीरे इस कार्य को अपने हाथ में लेने के लिए वित्त मंत्रालय के अंतर्गत गठित किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: FRBM अधिनियम, 2003 का उद्देश्य देश में वित्तीय अनुशासन स्थापित करना था। इसके मूल प्रावधानों और बाद के संशोधनों के तहत राजस्व घाटे को समाप्त करने और राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 3% तक लाने का लक्ष्य रखा गया था। कथन 2 गलत है: वर्ष 2018 के संशोधनों में केंद्र सरकार के लिए राजकोषीय घाटे को 2020-21 तक 3% लाने का लक्ष्य था (जिसे बाद में कोविड महामारी के कारण संशोधित किया गया)। साथ ही, FRBM समीक्षा समिति (एन.के. सिंह समिति) ने केंद्र सरकार के ऋण के लिए 40% और सामान्य सरकार (केंद्र और राज्य दोनों) के लिए 60% (यानी केंद्र के लिए लगभग 40% नहीं बल्कि केंद्र का लक्ष्य अलग था) का Debt-to-GDP अनुपात सुझाया था, किंतु वर्ष 2024-25 तक राजकोषीय घाटे को 4.5% तक नीचे लाने का मौजूदा लक्ष्य सरकार का मध्यम अवधि का राजकोषीय मार्ग है, लेकिन 40% केंद्र का ऋण लक्ष्य नहीं बल्कि कुल सामान्य सरकार का 60% (केंद्र का 40% और राज्यों का 20%) कुल ऋण का संचयी लक्ष्य है, जिससे कथन 2 तकनीकी रूप से और लक्षित वर्षों के संदर्भ में त्रुटिपूर्ण हो जाता है। कथन 3 सही है: वर्तमान में RBI सरकार के बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है (सरकारी प्रतिभूतियों का निर्गमन और प्रबंधन करता है), और वित्त मंत्रालय के अंतर्गत 'सार्वजनिक ऋण प्रबंधन प्रकोष्ठ' (PDMC) का गठन स्वतंत्र रूप से ऋण प्रबंधन कार्यों को भविष्य में समेकित करने के लिए किया गया है। अत: केवल कथन 1 और 3 सही हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 75' के अंतर्गत मंत्रियों की नियुक्ति, उनकी उत्तरदायिता और 'सामूहिक उत्तरदायित्व' (Collective Responsibility) के सिद्धांत के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, जिसमें यह संवैधानिक अनिवार्यता है कि मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या (प्रधानमंत्री सहित) लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
2. मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका अर्थ यह है कि लोकसभा द्वारा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध 'अविश्वास प्रस्ताव' (No-Confidence Motion) पारित किए जाने पर संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है, भले ही कोई व्यक्तिगत मंत्री उस नीति से असहमत क्यों न रहा हो।
3. भारत के संविधान में 'मंत्रिमंडल' (Cabinet) शब्द का मूल रूप से अनुच्छेद 75 में स्पष्ट उल्लेख किया गया था, और यह मंत्रिपरिषद का एक बड़ा निकाय है जिसके सभी सदस्य कैबिनेट बैठकों में नियमित रूप से भाग लेते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास और कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, प्राचीन भारतीय इतिहास में प्रयुक्त होने वाली 'शिल्प और आर्थिक शब्दावली' से संबंधित निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. श्रेणि (Shreni): यह प्राचीन भारत में व्यापारियों, शिल्पकारों और कारीगरों का एक निगम या संघ (Guild) होता था, जो अपने सदस्यों के लिए उत्पादन के नियम, मूल्य निर्धारण और मजदूरी तय करता था तथा जिसे अपनी निजी सेना रखने और अपने नियमों के तहत न्याय करने का अधिकार भी प्राप्त था।
2. सार्थवाह (Sarthavaha): यह प्राचीन काल में लंबी दूरी के व्यापारिक काफिलों का प्रमुख या नेता होता था, जो जोखिम भरे मार्गों से होकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक वस्तुओं का क्रय-विक्रय करने वाले व्यापारियों के समूह का नेतृत्व करता था।
3. विष्टि (Vishti): यह गुप्त औरोत्तर काल में प्रचलित एक प्रकार का कर (Tax) था, जिसके अंतर्गत राज्य द्वारा किसानों और कामगारों से बिना किसी पारिश्रमिक या मजदूरी के जबरन श्रम (Forced Labour / Begar) कराया जाता था।
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत केंद्र और राज्यों के बीच 'विधायी संबंधों' (अनुच्छेद 245 से 255) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार संसद को पूरे या भारत के किसी भी भाग के लिए कानून बनाने की प्रादेशिक शक्ति (Territorial jurisdiction) प्राप्त है, तथा संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को इस आधार पर अवैध घोषित नहीं किया जा सकता कि उनका अतिरिक्त-प्रादेशिक (Extra-territorial) प्रवर्तन होता है।
2. संविधान की सातवीं अनुसूची की 'समवर्ती सूची' (Concurrent List) के विषयों पर विधि बनाने की शक्ति संसद और राज्य विधानमंडलों दोनों को प्राप्त है, किंतु यदि किसी समवर्ती सूची के विषय पर राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून संसद द्वारा बनाए गए पूर्ववर्ती कानून के प्रतिकूल या असंगत है, तो संसद का कानून मान्य होगा और राज्य का कानून उस सीमा तक शून्य हो जाएगा, भले ही राज्य के कानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली हो।
3. संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से एक संकल्प पारित कर यह घोषित करे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या expedient है कि संसद राज्य सूची में प्रगणित किसी विषय पर कानून बनाए, तो संसद को उस विषय पर पूरे देश या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति मिल जाती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है, जिसे बार-बार अनिश्चितकाल तक बढ़ाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संसद के 'विशेषाधिकार प्रस्ताव' (Privilege Motion) तथा संसद सदस्यों के विशेषाधिकारों के हनन (Breach of Privilege) की प्रक्रिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. विशेषाधिकार प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन के किसी भी सदस्य द्वारा उस मंत्री या सदस्य के विरुद्ध लाया जा सकता है जिस पर यह आरोप हो कि उसने सदन या उसके किसी सदस्य के किसी विशेषाधिकार का हनन किया है या सदन के समक्ष तथ्यात्मक रूप से गलत या झूठे तथ्य प्रस्तुत करके सदन की अवमानना (Contempt of the House) की है।
2. लोकसभा में विशेषाधिकार प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए संबंधित सदस्य को बैठक शुरू होने से पहले सुबह निर्धारित समय तक अध्यक्ष को लिखित सूचना देनी होती है, और इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए सदन के कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन (लिखित या मौखिक) की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
3. यदि लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति द्वारा किसी विशेषाधिकार प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है, तो मामले को या तो सीधे सदन की 'विशेषाधिकार समिति' (Privilege Committee) को जांच के लिए भेज दिया जाता है या सदन स्वयं इस पर बहस करके निर्णय ले सकता है, और इस समिति की रिपोर्ट पर विचार करते समय यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी सदस्य या मंत्री को अपना पक्ष रखने का कोई अवसर दिया जाए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1928 में गठित 'नेहरू रिपोर्ट' (Nehru Report) और उसकी संस्तुतियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित इस समिति ने भारत के लिए 'डोमिनियन स्टेटस' (Dominion Status) की मांग की थी, जिसका उस समय जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा राष्ट्रवादियों द्वारा कड़ा विरोध किया गया था क्योंकि वे पूर्ण स्वराज्य के पक्ष में थे।
2. नेहरू रिपोर्ट में भारत के लिए एक नए संघीय संविधान का प्रस्ताव किया गया था जिसमें केंद्र में अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) निहित करने की संस्तुति की गई थी, जो कि ब्रिटिश भारत की एकात्मक प्रवृत्तियों के विपरीत राज्यों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करती।
3. इस रिपोर्ट में पहली बार देश के नागरिकों के लिए 'मौलिक अधिकारों' (Fundamental Rights) की एक निश्चित सूची की मांग की गई थी, जिसमें सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage) का प्रावधान भी शामिल था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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