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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा उनके संवैधानिक स्वरूप के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुतियों के आधार पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था, और वर्तमान में इनकी कुल संख्या ग्यारह है, जिन्हें अनुच्छेद 51क के अंतर्गत एक ही अनुच्छेद में समाहित किया गया है।
- 2. चूँकि ये मूल कर्तव्य विधिनुसार न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इनके उल्लंघन पर सीधे तौर पर किसी न्यायालय द्वारा दंड का प्रावधान संविधान के भाग IVक में नहीं किया गया है, किंतु संसद को यह विधिक अधिकार प्राप्त है कि वह इनमें से किसी भी कर्तव्य के प्रभावी क्रियान्वयन या उसके उल्लंघन को रोकने के लिए उपयुक्त विधियाँ (जैसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम या पर्यावरण संरक्षण अधिनियम) बना सकती है।
- 3. मूल कर्तव्यों का प्रावधान केवल भारत के नागरिकों पर ही लागू होता है, और किसी भी विदेशी नागरिक (चाहे वह भारत में निवासी हो या पर्यटक) पर ये कर्तव्य कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं बनाए गए हैं, तथा न्यायपालिका द्वारा कानूनों की संवैधानिक वैधता की व्याख्या करते समय मूल कर्तव्यों को ध्यान में नहीं रखा जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में स्थान नहीं दिया गया था। इन्हें सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था। मूल रूप से 10 कर्तव्य जोड़े गए थे, और 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा 11वां कर्तव्य जोड़ा गया। ये सभी अनुच्छेद 51क के अंतर्गत आते हैं।
कथन 2 सही है: मूल कर्तव्य गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं, यानी इनके हनन पर सीधे अदालती कार्रवाई का प्रावधान संविधान स्वयं नहीं करता है। हालांकि, संसद कानून बनाकर इनके क्रियान्वयन को बाध्यकारी या दंडात्मक बना सकती है (जैसे ध्वज संहिता, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम आदि)।
कथन 3 गलत है: मूल कर्तव्य केवल नागरिकों पर लागू होते हैं, यह बात बिल्कुल सही है; किंतु यह कहना गलत है कि न्यायपालिका कानूनों की संवैधानिक वैधता परखते समय इन्हें ध्यान में नहीं रख सकती। सर्वोच्च न्यायालय (जैसे स्वर्ण सिंह और ए.आई.एम.एस. मामलों में) ने यह स्पष्ट किया है कि विधियों की संवैधानिकता तय करते समय अदालतें मूल कर्तव्यों को प्रासंगिक मान सकती हैं और उनका सहारा ले सकती हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV-क' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51-क) तथा 42वें संविधान संशोधन (1976) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को संविधान में शामिल करने के लिए स्वर्ण सिंह समिति ने यह सिफारिश की थी कि नागरिकों को करों का भुगतान करने का कर्तव्य भी मूल कर्तव्यों में कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिसे संसद ने वर्ष 1976 में पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया था।
2. संविधान के अनुच्छेद 51-क के अंतर्गत प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
3. स्वर्ण सिंह समिति की मूल सिफारिशों में नागरिकों द्वारा कर्तव्यों का पालन न करने पर दंड या शास्ति (Penalty) आरोपित करने का प्रावधान करने का सुझाव दिया गया था, जिसे इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान संशोधन अधिनियम में अनिवार्य रूप से शामिल कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) के संदर्भ में, भारत में 'डिजिटल ऋण' (Digital Lending) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के विधिक एवं नियामक दिशा-निर्देशों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के डिजिटल ऋण पर दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी विनियमित संस्थाओं (Regulated Entities - REs) और उनके द्वारा नियुक्त डिजिटल ऋणदाताओं (Lending Service Providers - LSPs) के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि ऋण से संबंधित सभी भुगतानों और संवितरणों का आदान-प्रदान सीधे उधारकर्ता (Borrower) के बैंक खाते और विनियमित संस्था के खाते के बीच ही होना चाहिए, तथा बीच में किसी भी तीसरे पक्ष (Third-party) के पूल खातों या पास-थ्रू खातों का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
2. डिजिटल ऋण देने वाली कंपनियों या ऐप्स (Apps) के माध्यम से उपयोगकर्ताओं के मोबाइल डेटा, संपर्क सूचियों (Contact Lists) और मीडिया फाइलों तक अत्यधिक और अवांछित पहुंच (Excessive Data Harvesting) को रोकने के लिए आरबीआई के नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि ऋणदाताओं को न्यूनतम आवश्यक जानकारी ही एकत्र करनी होगी और वे उपयोगकर्ताओं की अनुमति के बिना उनके फोन की संपूर्ण संपर्क सूची या अन्य संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा तक पहुंच प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
3. आरबीआई के इन नए विधिक नियमों के तहत, यदि कोई डिजिटल ऋण प्रदाता (LSP) बिना किसी पूर्व सूचना या अनुचित तरीके से ऋण वसूली के लिए उधारकर्ता या उसके संपर्कों को परेशान करता है, तो ऐसी स्थिति में उधारकर्ता के पास केवल दीवानी न्यायालय (Civil Court) में हर्जाने का दावा करने का कानूनी विकल्प होता है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक के पास ऐसे मध्यस्थों के खिलाफ प्रत्यक्ष दंडात्मक कार्रवाई करने या उनकी डिजिटल सेवाओं को निलंबित करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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मौलिक कर्तव्य संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत आते हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' के अंतर्गत 'निर्वाचन' (Elections - अनुच्छेद 324 से 329A) तथा चुनाव आयोग एवं निर्वाचन सुधारों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार संसद, राज्य के विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की संपूर्ण शक्ति 'भारतीय निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) में निहित होती है, जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त और उतने ही अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं जितने राष्ट्रपति समय-समय पर निर्धारित करते हैं।
2. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय पद से हटाया जा सकता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह समय-समय पर विधि द्वारा निर्वाचनों से संबंधित सभी मामलों के संबंध में उपबंध कर सके, जिसमें संसद और राज्य के विधानमंडलों के सदनों के लिए निर्वाचन सूचियों का तैयार किया जाना, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और सदन के गठन से संबंधित अन्य सभी विषय शामिल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) और इसके न्यायिक पुनरावलोकन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार, यदि किसी राज्य का राज्यपाल इस आशय का प्रतिवेदन देता है या अन्यथा समाधान हो जाता है कि उस राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती है, तो राष्ट्रपति उस राज्य के शासन के सभी या कुछ कृत्य अपने हाथ में ले सकता है।
2. ऐतिहासिक 'एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' वाद में उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह निर्णय दिया था कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायोचित (Justiciable) है और यदि उद्घोषणा का आधार अप्रासंगिक, तर्कहीन या दुर्भावनापूर्ण पाया जाता है, तो न्यायालय उस उद्घोषणा को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
3. एस.आर. बोम्मई वाद के निर्णय के पश्चात, संसद द्वारा पारित 'चवालीसवें संविधान संशोधन अधिनियम' के माध्यम से यह अनिवार्य कर दिया गया कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा उसकी घोषणा की तारीख से दो महीने के भीतर साधारण बहुमत द्वारा अनुमोदित किया जाना आवश्यक है।
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