त्वरित लिंक्स
Civil services
18 views
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329क) के अंतर्गत 'भारत के निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) तथा चुनावी सुधारों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग एक अखिल भारतीय निकाय है, जो संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति अपने में निहित रखता है, और मूल संविधान में इसे एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में स्थापित किया गया था जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अलावा दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों का होना अनिवार्य किया गया था।
- 2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए निर्धारित की गई है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है।
- 3. निर्वाचन आयोग को संसद या राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की अयोग्यता के प्रश्नों पर निर्णय देने की शक्ति सीधे तौर पर प्राप्त नहीं है, बल्कि इस संबंध में आयोग केवल राष्ट्रपति या संबंधित राज्य के राज्यपाल को अपनी परामर्शदात्री (Advisory) राय देता है, और राष्ट्रपति या राज्यपाल इस राय के अनुसार निर्णय लेने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि मूल संविधान में निर्वाचन आयोग केवल एक एकल-सदस्यीय (Single-member) निकाय था, जिसमें केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त होता था। इसे पहली बार 1989 में बहु-सदस्यीय बनाया गया था। कथन 2 असत्य है क्योंकि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीश के समान है (न कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान)। साथ ही, अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश (Recommendation) अनिवार्य होती है। कथन 3 सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 103 (संसद सदस्यों के लिए) और अनुच्छेद 192 (राज्य विधानमंडल सदस्यों के लिए) के अनुसार, यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या संसद या राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य किसी अयोग्यता से ग्रसित है, तो वह मामला राष्ट्रपति या राज्यपाल को भेजा जाता है, जो निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य होते हैं।
Related Questions
→
भारत और किस देश के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास डस्टलिक का 7वां संस्करण आयोजित किया जा रहा है?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत 'विधायन शक्तियों के वितरण' (Distribution of Legislative Powers - अनुच्छेद 245 से 255) तथा इससे जुड़े प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से कोई संकल्प पारित कर देती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी विषय पर कानून बनाए, तो संसद को पूरे भारत या उसके किसी भाग के लिए उस विषय पर विधि बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 252 के प्रावधानों के तहत यदि दो या अधिक राज्यों के विधानमंडल इस आशय के संकल्प पारित कर दें कि राज्य सूची के किसी विषय पर संसद द्वारा विधि बनाई जानी चाहिए, तो संसद उस विषय पर उन राज्यों के लिए कानून बना सकती है, और ऐसा अधिनियमित कानून किसी अन्य ऐसे राज्य पर भी स्वतः लागू हो जाता है जो बाद में अपनी विधानसभा में बिना किसी संकल्प के इसमें शामिल होना चाहे।
3. भारत में अपशिष्ट विधायी शक्तियाँ (Residuary Powers) अमेरिकी संविधान की तर्ज पर राज्यों को प्रदान की गई हैं, जिसका अर्थ है कि वे सभी विषय जो संघ सूची, राज्य सूची या समवर्ती सूची में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं हैं, उन पर कानून बनाने का अंतिम अधिकार संबंधित राज्य विधानमंडलों के पास होता है, और इस पर सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार केवल न्यायिक समीक्षा तक सीमित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
→
भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal - NGT)' की स्थापना, उसकी अधिकारिता और शक्तियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना वर्ष 2010 में 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रभावी और तीव्र प्रवर्तन के लिए की गई थी, और भारत ऐसा करने वाला दुनिया का तीसरा देश (ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद) तथा पहला विकासशील देश बन गया है।
2. NGT को पर्यावरण से जुड़े मामलों की सुनवाई करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के तहत निर्धारित सभी प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है, और वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) से बंधा हुआ नहीं है।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेशों या निर्णयों से व्यथित कोई भी व्यक्ति इस अधिकरण के आदेश के 90 दिनों के भीतर सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में अपील दायर कर सकता है, क्योंकि इस अधिनियम के तहत उच्च न्यायालयों (High Courts) की अपीलिय अधिकारिता को पूरी तरह से अपवर्जित (Exclude) कर दिया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
दिल्ली में कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण किसने कराया था?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.