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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' (संघ - अनुच्छेद 52 से 151) तथा 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General for India - अनुच्छेद 76) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति को की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित (Qualified) है, तथा संविधान में महान्यायवादी के लिए कोई निश्चित कार्यकाल निर्धारित नहीं किया गया है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) पद धारण करता है।
- 2. भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों और संसद की किसी भी समिति (जिसका वह सदस्य नामित किया गया हो) में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
- 3. महान्यायवादी भारत सरकार का पूर्णकालिक विधि अधिकारी (Full-time legal officer) होता है, और संविधान के नियमों के अनुसार वह किसी भी निजी कानूनी प्रैक्टिस या मुक़दमे में सरकार के विरुद्ध पैरवी नहीं कर सकता है, क्योंकि यह उसके पेशेवर आचरण के विरुद्ध एक सांविधिक प्रतिबंध है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार, राष्ट्रपति भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) की नियुक्ति करता है। महान्यायवादी बनने के लिए व्यक्ति में वही योग्यता होनी चाहिए जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए आवश्यक होती है (यानी वह किसी उच्च न्यायालय का कम से कम 5 वर्ष तक न्यायाधीश या 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो, या राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हो)। उसका कोई निश्चित कार्यकाल संविधान द्वारा तय नहीं किया गया है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
कथन 2 सही है: अनुच्छेद 88 के अनुसार, महान्यायवादी को संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) या उनकी संयुक्त बैठक तथा संसद की किसी भी समिति में, जिसका वह सदस्य बनाया गया हो, बोलने और भाग लेने का अधिकार है, लेकिन उसे मतदान करने का अधिकार (Right to vote) नहीं है।
कथन 3 गलत है: महान्यायवादी भारत सरकार का पूर्णकालिक विधि अधिकारी नहीं होता है। वह निजी कानूनी प्रैक्टिस (Private legal practice) कर सकता है, बशर्ते वह मामला भारत सरकार के विरुद्ध न हो या जिसमें सरकार को विपक्षी न बनाया गया हो, क्योंकि उसे सरकार के खिलाफ किसी भी मुक़दमे में सलाह देने या पैरवी करने से प्रतिबंधित किया गया है।
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1. व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत महात्मा गांधी द्वारा ब्रिटिश सरकार के इस दावे को चुनौती देने के लिए की गई थी कि भारत के लोगों ने बिना किसी शर्त के द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन किया है।
2. इस सत्याग्रह के तहत चुने जाने वाले सत्याग्रही को पहले से ही व्यापक पैमाने पर जनता को जुटाने (Mass mobilization) की अनुमति थी, ताकि ब्रिटिश विरोधी प्रदर्शनों से पूरे देश में एक साथ प्रशासनिक तंत्र ठप हो जाए।
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