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Indian Polity
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समान नागरिक संहिता (UCC) किस अनुच्छेद में वर्णित है?

Detailed Explanation

अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता का प्रावधान करता है।
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→ राज्य विधानमंडल के अंतर्गत 'विधान परिषद' (Legislative Council) के सृजन, उत्सादन, संरचना और इसकी विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए विधि बना सकती है, बशर्ते संबंधित राज्य की विधानसभा ने कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का संकल्प पारित कर दिया हो। 2. विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु किसी भी परिस्थिति में विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या 40 से कम नहीं होनी चाहिए (अपवाद स्वरूप जम्मू-कश्मीर विधान परिषद जब अस्तित्व में थी तब इसकी संख्या भिन्न थी)। 3. विधान परिषद के कुल सदस्यों का 1/12 भाग ऐसे स्नातकों (Graduates) द्वारा निर्वाचित होता है जो उस राज्य में कम से कम तीन वर्ष से निवास कर रहे हों, तथा एक अन्य 1/12 भाग ऐसे अध्यापकों द्वारा चुना जाता है जो राज्य के भीतर माध्यमिक विद्यालयों से नीचे स्तर के शिक्षण संस्थानों में कम से कम तीन वर्ष से अध्यापन कार्य कर रहे हों। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के साथ-साथ राज्यों में पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की संपूर्ण शक्ति रखता है। 2. वर्ष 1989 के 61वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से मतदान की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया, और इसी वर्ष निर्वाचन आयोग को एक बहु-सदस्यीय (Multi-member) निकाय में परिवर्तित कर दिया गया जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल किए गए। 3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (3) के अनुसार, यदि किसी सांसद या विधायक को किसी अपराध में दोषी ठहराया जाता है और उसे कम से कम 2 वर्ष या उससे अधिक की कारावास की सजा सुनाई जाती है, तो वह सजा की तिथि से अयोग्य हो जाता है और सजा की अवधि समाप्त होने के पश्चात भी अगले 6 वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बना रहता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (अनुच्छेद 72) और उसकी विधायी तथा कार्यकारी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) के अंतर्गत क्षमा, प्रलंबन, विराम, परिहार और लघुकरण शामिल हैं, और उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के अनुसार राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग करते समय मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए पूर्णतः बाध्य है तथा राष्ट्रपति द्वारा इस पर लिया गया निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर होता है। 2. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति केवल तभी प्रयोग की जा सकती है जब संसद के दोनों सदनों में से कोई एक सदन या दोनों सदन सत्र में न हों; इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की संविधि वही होती है जो संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम की होती है। 3. राष्ट्रपति को भारत के महान्यायवादी (Attorney General), नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG), मुख्य चुनाव आयुक्त तथा संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु राष्ट्रपति अपने स्वविवेक का प्रयोग करते हुए लोकसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में प्रधानमंत्री की नियुक्ति के मामले में संविधान प्रदत्त अपने विवेक का उपयोग कर सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण शक्ति (अनुच्छेद 123) तथा क्षमादान की शक्ति (अनुच्छेद 72) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रपति की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति संसद की विधि बनाने की शक्ति के सह-विस्तार (Co-extensive) होती है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति उसी विषय पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिन विषयों पर संसद कानून बना सकती है, किंतु इस शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा अपने व्यक्तिगत विवेक (Discretion) से किया जा सकता है, इसके लिए केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह अनिवार्य नहीं होती है। 2. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमादान की जो शक्ति प्राप्त है, उसके अंतर्गत राष्ट्रपति सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड या मृत्युदंड के मामलों में भी पूर्ण क्षमादान (Pardon) दे सकता है, तथा राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) के विपरीत राष्ट्रपति के इस अधिकार पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का कोई प्रतिबंध नहीं होता है। 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'कृष्णा अय्यर बनाम राज्य' या अन्य न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान की याचिका पर निर्णय लेते समय की गई देरी (Inordinate Delay) के आधार पर अपराधी की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है, किंतु राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का दायरा पूरी तरह से वर्जित है और अदालतें राष्ट्रपति के निर्णय की शुचिता की जांच नहीं कर सकती हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 352 में 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द को हटाकर उसकी जगह 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) शब्द को जोड़ा गया, तथा यह भी अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) द्वारा इसका लिखित अनुमोदन प्रधानमंत्री सहित संघ के कैबिनेट मंत्रियों की बैठक में किया गया हो। 2. राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त छह स्वतंत्रताएं स्वतः निलंबित हो जाती हैं, भले ही आपातकाल 'युद्ध या बाह्य आक्रमण' के आधार पर लगाया गया हो या 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर, और इसके लिए अलग से किसी राष्ट्रपति के आदेश की आवश्यकता नहीं होती है। 3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) की उद्घोषणा को एक बार में संसद द्वारा अनुमोदित किए जाने के पश्चात अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, जिसे बाद में 44वें संशोधन द्वारा घटाकर छह महीने कर दिया गया। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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