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BPSC TRE 4.0
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) तथा संसद (राज्य सभा और लोकसभा) की विधाई शक्तियों एवं कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, किंतु उसे हटाने के लिए संविधान में महाभियोग जैसी किसी विशिष्ट प्रक्रिया का उल्लेख नहीं है।
  2. 2. महान्यायवादी को भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का पूर्ण अधिकार है, किंतु उसे संसद के किसी भी सदन में मतदान करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
  3. 3. राज्य सभा एक स्थायी सदन है जिसका विघटन नहीं होता है, तथा इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है, जिनमें से एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त होते हैं, और संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्य सभा में अधिकतम सदस्यों की संख्या 250 निर्धारित की गई है।
  4. 4. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है, और यदि राज्य सभा इस विधेयक को पारित किए बिना 14 दिनों से अधिक समय तक रोक लेती है, तो वह दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित माना जाता है जिस रूप में वह लोकसभा द्वारा पारित किया गया था, और इस मामले में राज्य सभा की सिफारिशें लोकसभा के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होती हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?

Detailed Explanation

इस प्रश्न के विश्लेषण के अनुसार कथन 1, 2 और 3 पूर्णतः सत्य हैं। कथन 4 असत्य है क्योंकि धन विधेयक (Money Bill) के संबंध में राज्य सभा की सिफारिशें लोकसभा के लिए पूर्णतः **बाध्यकारी नहीं** होती हैं; लोकसभा के पास यह अधिकार होता है कि वह राज्य सभा की सभी या किसी भी सिफारिश को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। यदि लोकसभा राज्य सभा की सिफारिशों को स्वीकार नहीं करती है, तब भी वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित माना जाता है जैसा लोकसभा ने मूल रूप से पारित किया था। भारतीय राजव्यवस्था से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण और विश्लेषणात्मक प्रश्नों का अभ्यास करने के लिए बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पोर्टल पर विजिट करें।
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