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भारतीय संविधान के अंतर्गत महान्यायवादी (Attorney General for India) तथा संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्य सभा) की कार्यप्रणाली और शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है तथा उन्हें संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में भाग लेने और बोलने का संवैधानिक अधिकार है, किंतु उन्हें संसद में किसी भी मामले पर मतदान (Voting) करने का अधिकार नहीं है।
  2. 2. राज्य सभा को संविधान के अनुच्छेद 249 के तहत यह विशिष्ट शक्ति प्राप्त है कि वह उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्व का घोषित कर सकती है, और ऐसा प्रस्ताव एक बार में अनिश्चित काल के लिए प्रभावी रहता है जब तक कि संसद इसे स्वयं रद्द न कर दे।
  3. 3. लोकसभा में पेश किए जाने वाले 'धन विधेयक' (Money Bill) के संबंध में यह प्रावधान है कि यदि राज्य सभा धन विधेयक की प्राप्ति के 14 दिनों के भीतर कोई संस्तुति या सिफारिश वापस नहीं करती है, तो उस विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है, भले ही लोकसभा ने राज्य सभा की किसी भी सिफारिश को स्वीकार न किया हो।
  4. 4. महान्यायवादी के कार्यकाल और पारिश्रमिक का निर्धारण सीधे संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत किया गया है, जिसके अनुसार वे भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा पांच वर्ष की निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किए जाते हैं और संसद द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पारित करके ही हटाए जा सकते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सत्य है क्योंकि भारत के महान्यायवादी (अनुच्छेद 76) को भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार है और उन्हें अनुच्छेद 88 के तहत संसद के दोनों सदनों में बोलने तथा कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है, किंतु मतदान का अधिकार नहीं है। कथन 2 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 249 के तहत राज्य सभा द्वारा पारित ऐसा प्रस्ताव अधिकतम **एक वर्ष** के लिए प्रभावी रहता है, अनिश्चित काल के लिए नहीं। कथन 3 पूर्णतः सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक के मामले में राज्य सभा को केवल 14 दिन का समय मिलता है और उसकी सिफारिशों को मानना लोकसभा के लिए बाध्यकारी नहीं है। कथन 4 असत्य है क्योंकि महान्यायवादी का कार्यकाल संविधान द्वारा निश्चित नहीं किया गया है और वे 'राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत' (During the Pleasure of the President) पद धारण करते हैं, न कि मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर या महाभियोग द्वारा। अधिक अभ्यास और तैयारी के लिए बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पोर्टल पर विजिट करें।
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