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BPSC TRE 4.0
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दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक इतिहास और 'मध्यकालीन इतिहास' के संदर्भ में, तुगलक वंश के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक द्वारा उठाए गए प्रशासनिक, धार्मिक और लोक-कल्याणकारी सुधारों के निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. फिरोजशाह तुगलक ने शरियत के नियमों के विरुद्ध लिए जाने वाले चौबीस कष्टदायक करों (अवाब) को समाप्त कर दिया और केवल कुरान द्वारा स्वीकृत चार करों — खराज, जकात, जजिया और खुम्स — को ही वैध ठहराया, तथा ब्राह्मणों पर भी जजिया कर लागू किया।
- 2. उसने दासों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए एक नए विभाग 'दीवान-ए-बन्दगान' (दास विभाग) की स्थापना की, तथा सिंचाई की सुविधा के लिए यमुना और सतलज नदियों से कई बड़ी नहरों का निर्माण करवाया, जिस पर किसानों से 'हक-ए-शर्ब' (सिंचाई कर) नामक कर वसूला जाता था।
- 3. फिरोजशाह तुगलक ने सल्तनत काल में जागीर प्रथा को समाप्त कर दिया और सैनिकों को भूमि देने के बजाय पूरी तरह से नकद वेतन देने की अनिवार्य व्यवस्था लागू की, जिससे सैन्य संगठन में भ्रष्टाचार का पूर्ण उन्मूलन हो गया।
- 4. उसने गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता के लिए 'दीवान-ए-खैरात' (दान विभाग) नामक एक नए विभाग की स्थापना की, जिसके माध्यम से मुस्लिम अनाथों और विधवाओं को आर्थिक सहायता तथा गरीब लड़कियों के विवाह की व्यवस्था की जाती थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
मध्यकालीन भारतीय इतिहास में फिरोजशाह तुगलक (1351–1388 ई.) के सुधार अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। कथन 1, 2 और 4 पूर्णतः सत्य हैं; उसने शरियत के विरुद्ध लिए जाने वाले 24 कष्टदायक करों को समाप्त किया और चार कानूनी कर रखे तथा ब्राह्मणों पर जजिया लगाया। उसने 'दीवान-ए-बन्दगान' और 'दीवान-ए-खैरात' की स्थापना की तथा नहरों का निर्माण कराकर 'हक-ए-शर्ब' कर लगाया। किंतु कथन 3 असत्य है क्योंकि उसने अलाउद्दीन खिलजी की नकद वेतन नीति को उलट दिया और इक्ता व्यवस्था तथा सैनिकों की जागीर व वंशागत प्रथा को पुनः जीवित कर दिया था, जिससे सैन्य व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ गया था। ऐसी ही गहन अध्ययन सामग्री के लिए बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पोर्टल पर विजिट करें।
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बिहार की लोक कला, संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'सुजानी' और 'खतवा' बिहार की पारंपरिक सुई-शिल्प (Applique and Quilting) कलाएँ हैं, जिनका मुख्य केंद्र मुजफ्फरपुर और वैशाली क्षेत्र रहा है, जहाँ पुराने कपड़ों की परतों को सिलकर उस पर विभिन्न प्रकार के लोक-मोटीफ और ज्यामितीय डिजाइन उकेरे जाते हैं।
2. भोजपुरी क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनृत्य 'डोमकाच' मुख्य रूप से विवाह उत्सवों और मांगलिक अवसरों पर महिलाओं द्वारा किया जाने वाला एक स्वांग (Dance-drama) आधारित नृत्य है, जिसमें पुरुष वेशभूषा धारण कर व्यंग्यात्मक और हास्य प्रस्तुतियां देते हैं।
3. ऐतिहासिक धरोहरों के अंतर्गत प्रसिद्ध 'सकीना मस्जिद' या शेर शाह सूरी का मकबरा सासाराम में स्थित है, जो इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है और एक कृत्रिम झील के मध्य ऊंचे चबूतरे पर अष्टकोणीय योजना में निर्मित है।
4. मिथिला क्षेत्र में दीपावली और गोवर्धन पूजा के अवसर पर गाय के गोबर से घर के आंगनों और दीवारों पर गोवर्धन पर्वत तथा विभिन्न पशु-पक्षियों के पारंपरिक भित्ति चित्र बनाने की लोक परंपरा को 'गोवर्धना पूजा कला' या 'यामा कला' कहा जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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सिंधु घाटी के लोग थे :
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