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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग, राजभाषा और राजनीतिक दलों से संबंधित विधिक उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 344 के प्रावधानों के अनुपालन में राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 1955 में बाल गंगाधर खेर (बी.जी. खेर) की अध्यक्षता में प्रथम राजभाषा आयोग का गठन किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में यह संस्तुति दी थी कि उच्च न्यायालयों (High Courts) की कार्यवाहियों में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी या संबंधित राज्य की क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग वैकल्पिक रूप से किया जाना चाहिए।
- 2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) में राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु निर्वाचन आयोग को किसी पंजीकृत राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द (De-register) करने की कोई विधिक या संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है, सिवाय इसके कि दल ने धोखाधड़ी करके पंजीकरण प्राप्त किया हो या उसके संविधान में संशोधन कर लिया हो।
- 3. संविधान की नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, और इसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि इसमें शामिल किए जाने वाले विधियों को न्यायिक समीक्षा से पूर्णतः सुरक्षित कर दिया जाएगा, किंतु केशवानंद भारती वाद (1973) के पश्चात उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए ऐसे कानून भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएंगे जो संविधान के मूलभूत ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 344 के तहत राष्ट्रपति ने जून 1955 में बी.जी. खेर की अध्यक्षता में प्रथम राजभाषा आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने न्यायालयों की भाषा और अन्य विषयों पर अपनी संस्तुतियाँ दी थीं।
कथन 2 असत्य है: हालांकि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों का पंजीकरण करता है, किंतु उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के विभिन्न निर्णयों के अनुसार, यदि कोई दल संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ का उल्लंघन करता है या आंतरिक लोकतंत्र नहीं रखता है, तो निर्वाचन आयोग के पास कुछ विशिष्ट परिस्थितियों (जैसे अत्यधिक गंभीर धोखाधड़ी या असंवैधानिक गतिविधियों) में पंजीकरण रद्द करने की न्यायिक शक्ति निहित मानी गई है (यद्यपि यह एक विवादास्पद और सीमित क्षेत्र है, किंतु सामान्यतः निर्वाचन आयोग के पास सीधे स्वतः संज्ञान लेकर निरस्त करने की वैधानिक शक्ति नहीं है, और मूल रूप से कथन में यह अतिव्याप्ति है कि 'पंजीकरण रद्द करने की कोई शक्ति नहीं है', जबकि सांविधिक रूप से सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इस पर विचार किया है; तथापि, आयोग दल का नाम अपनी सूची से हटा सकता है यदि वह अस्तित्वहीन हो जाए)। मुख्य रूप से यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण है कि निर्वाचन आयोग को सीधे राजनीतिक दलों को विघटित करने की शक्ति नहीं है, परंतु सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यदि कोई दल आंतरिक रूप से संविधान का उल्लंघन करता है तो आयोग उचित कदम उठा सकता है। इसके विपरीत, यहाँ सबसे बड़ा तकनीकी दोष यह है कि कथन 2 में यह कहा गया है कि आयोग के पास कोई शक्ति नहीं है, जबकि यदि कोई दल अवैध रूप से पंजीकृत हुआ हो तो निरस्तीकरण का प्रश्न उठता है। इसके अलावा, राजनीति विज्ञान और राजव्यवस्था के विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के पोर्टल का संदर्भ ले सकते हैं।
कथन 3 सही है: प्रथम संविधान संशोधन 1951 द्वारा नौवीं अनुसूची जोड़ी गई थी। केशवानंद भारती मामले (1973) और आई.आर. कोएल्हो मामले (2007) में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में जोड़े गए सभी कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि वे मौलिक अधिकारों या संविधान के मूल ढांचे का हनन करते हैं।
कथन 2 असत्य है: हालांकि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों का पंजीकरण करता है, किंतु उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के विभिन्न निर्णयों के अनुसार, यदि कोई दल संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ का उल्लंघन करता है या आंतरिक लोकतंत्र नहीं रखता है, तो निर्वाचन आयोग के पास कुछ विशिष्ट परिस्थितियों (जैसे अत्यधिक गंभीर धोखाधड़ी या असंवैधानिक गतिविधियों) में पंजीकरण रद्द करने की न्यायिक शक्ति निहित मानी गई है (यद्यपि यह एक विवादास्पद और सीमित क्षेत्र है, किंतु सामान्यतः निर्वाचन आयोग के पास सीधे स्वतः संज्ञान लेकर निरस्त करने की वैधानिक शक्ति नहीं है, और मूल रूप से कथन में यह अतिव्याप्ति है कि 'पंजीकरण रद्द करने की कोई शक्ति नहीं है', जबकि सांविधिक रूप से सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इस पर विचार किया है; तथापि, आयोग दल का नाम अपनी सूची से हटा सकता है यदि वह अस्तित्वहीन हो जाए)। मुख्य रूप से यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण है कि निर्वाचन आयोग को सीधे राजनीतिक दलों को विघटित करने की शक्ति नहीं है, परंतु सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यदि कोई दल आंतरिक रूप से संविधान का उल्लंघन करता है तो आयोग उचित कदम उठा सकता है। इसके विपरीत, यहाँ सबसे बड़ा तकनीकी दोष यह है कि कथन 2 में यह कहा गया है कि आयोग के पास कोई शक्ति नहीं है, जबकि यदि कोई दल अवैध रूप से पंजीकृत हुआ हो तो निरस्तीकरण का प्रश्न उठता है। इसके अलावा, राजनीति विज्ञान और राजव्यवस्था के विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के पोर्टल का संदर्भ ले सकते हैं।
कथन 3 सही है: प्रथम संविधान संशोधन 1951 द्वारा नौवीं अनुसूची जोड़ी गई थी। केशवानंद भारती मामले (1973) और आई.आर. कोएल्हो मामले (2007) में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में जोड़े गए सभी कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि वे मौलिक अधिकारों या संविधान के मूल ढांचे का हनन करते हैं।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति, उनके पद की शक्तियों तथा प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्यों (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है, जिसमें राज्य विधानसभाओं के सदस्यों की कोई भूमिका नहीं होती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 75(1) के तहत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा संविधान में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित किया गया है कि मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या (प्रधानमंत्री सहित) लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
3. संविधान के अनुच्छेद 78 के अंतर्गत प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय और विधान के प्रस्ताव राष्ट्रपति को संसूचित करे, और यदि राष्ट्रपति ऐसा निर्देश दे, तो किसी ऐसे विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, मंत्रिपरिषद के समक्ष विचार के लिए प्रस्तुत करे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power - अनुच्छेद 72) और उसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में भी क्षमादान देने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति की यह शक्ति राज्यपाल की अनुच्छेद 161 के अंतर्गत प्रदत्त क्षमादान शक्ति की तुलना में अधिक विस्तृत है क्योंकि राज्यपाल को मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान देने की कोई संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
2. राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका (Mercy Petition) पर निर्णय लेते समय केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह मानना संवैधानिक रूप से अनिवार्य होता है, और राष्ट्रपति की इस क्षमादान शक्ति के प्रयोग को किसी भी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं लाया जा सकता क्योंकि यह राष्ट्रपति का पूर्ण और अंतिम विवेकाधिकार है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि यदि राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका के निपटारे में अत्यधिक और अकारण विलंब (Inordinate Delay) किया जाता है, तो इस आधार पर दोषियों के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है, क्योंकि यह विलंब संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और सदनों की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं; और यदि राज्यसभा किसी धन विधेयक को बिना किसी संशोधन के लौटा देती है या चौदह दिन की समयावधि बीत जाती है, तो वह विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है, भले ही राज्यसभा ने उस पर औपचारिक मतदान न किया हो।
2. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) केवल साधारण विधेयकों और वित्तीय विधेयकों (श्रेणी-I) के मामलों में ही आहत कर सकता है, जबकि संविधान संशोधन विधेयकों तथा धन विधेयकों के संदर्भ में संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
3. लोकसभा द्वारा पारित और राज्यसभा को प्रेषित किसी साधारण विधेयक के संबंध में यदि दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न होता है और राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुलाने की मंशा की सूचना दे देता है, तो राज्यसभा द्वारा विधेयक को छह महीने तक रोक लेने की स्थिति में ही संयुक्त बैठक आहूत की जा सकती है, भले ही इस अवधि के दौरान लोकसभा विघटित हो गई हो।
4. संसद में विधाई प्रक्रिया के दौरान यदि कोई विधेयक लोकसभा में लंबित है और लोकसभा के विघटन के कारण वह व्यपगत (Lapse) हो जाता है, किंतु राष्ट्रपति ने उसके संबंध में संयुक्त बैठक बुलाने की अपनी मंशा अधिसूचित कर दी है, तो ऐसा विधेयक व्यपगत नहीं होगा और वह संयुक्त बैठक में विचार के लिए जीवित बना रहेगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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