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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) की संवैधानिक स्थिति, विषय-वस्तु और उनके प्रवर्तन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. मूल संविधान में मूल कर्तव्यों का कोई प्रावधान नहीं था, किंतु स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति के आधार पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा इन्हें संविधान के भाग IV-A में अनुच्छेद 51A के तहत जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत प्रारंभ में दस मूल कर्तव्य शामिल किए गए थे।
- 2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A में यह प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे, तथा यह मूल कर्तव्य इस सूची में तीसरे स्थान (खंड 'c') पर उल्लिखित है।
- 3. वर्मा समिति (1999) ने कुछ मूल कर्तव्यों के कानूनी प्रवर्तन के लिए कानूनी प्रावधानों की पहचान की थी, जैसे कि 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971' और 'लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951', किंतु ये मूल कर्तव्य अपने आप में प्रकृति से न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इनके उल्लंघन पर सीधे संविधान के तहत न्यायालय द्वारा दंड का स्वतः प्रावधान नहीं किया गया है जब तक कि संसद इसके लिए विशिष्ट कानून न बनाए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए तीनों कथन सही हैं। मूल कर्तव्यों को 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर जोड़ा गया था। अनुच्छेद 51A के खंड (c) के तहत भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना नागरिक का मूल कर्तव्य है। वर्मा समिति (1999) ने इनके क्रियान्वयन से जुड़े कानूनों की पहचान की थी। ये प्रकृति से गैर-न्यायोचित (Non-justiciable) हैं, यानी इनके उल्लंघन पर स्वतः न्यायिक दंड का प्रावधान नहीं है जब तक संसद कानून न बनाए। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विस्तृत अध्ययन करें।
Related Questions
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल की विधाई शक्तियों, विधानसभा और विधान परिषद के अंतर्संबंधों तथा धन विधेयक के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार, यदि विधान परिषद द्वारा किसी साधारण विधेयक को अस्वीकार कर दिया जाता है या विधान परिषद के संशोधनों से विधानसभा सहमत नहीं होती है, तो विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पारित कर सकती है, और विधान परिषद इस विधेयक को अधिकतम चार महीने (प्रथम बार तीन महीने और पुनः भेजने पर एक महीना) तक ही रोक सकती है।
2. धन विधेयक (Money Bill) के संबंध में विधान परिषद की शक्ति अत्यंत सीमित होती है; विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक जब विधान परिषद के पास भेजा जाता है, तो विधान परिषद को उसे बिना किसी संशोधन या अपनी सिफारिश के अधिकतम 14 दिनों के भीतर विधानसभा को लौटाना होता है, और यदि वह ऐसा नहीं करती है, तो उस अवधि की समाप्ति पर वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
3. अनुच्छेद 169 के अंतर्गत किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए संसद द्वारा विधि बनाई जाती है, जिसके लिए यह अनिवार्य है कि संबंधित राज्य की विधानसभा अपने कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का संकल्प पारित करे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत शहरी स्थानीय शासन (नगरपालिकाओं) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस संशोधन द्वारा संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया है, जिसमें अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक के प्रावधान शामिल हैं, तथा इसके माध्यम से बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई है जिसमें नगरपालिकाओं के क्षेत्राधिकार के लिए 18 कार्यात्मक विषयों का उल्लेख किया गया है।
2. नगरपालिकाओं के सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए कुल आरक्षित सीटों का कम से कम एक-तिहाई (33 प्रतिशत) भाग प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरी जाने वाली सीटों के लिए आरक्षित होना अनिवार्य किया गया है, किंतु यह आरक्षण महिलाओं के लिए नगरपालिकाओं के अध्यक्षों (Chairpersons) के पदों पर लागू नहीं होता है, क्योंकि अध्यक्षों के संबंध में निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार राज्य विधानमंडल के विवेक पर निर्भर है।
3. प्रत्येक राज्य में नगरपालिकाओं के लिए वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने और संचित निधि से अनुदानों के आवंटन की संस्तुति करने के लिए 73वें संशोधन के तहत गठित 'राज्य वित्त आयोग' को ही 74वें संशोधन के अंतर्गत नगरपालिकाओं के संबंध में भी वित्तीय समीक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा गया है, जिसके लिए अलग से किसी नए वित्त आयोग के गठन की आवश्यकता नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा तथा राज्यसभा की विधाई शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अनुसार लोकसभा में लंबित कोई विधेयक, जो लोकसभा के विघटन के कारण व्यपगत (Lapse) हो जाता है, राज्यसभा में लंबित ऐसा विधेयक व्यपगत नहीं होता जिसे लोकसभा द्वारा पारित नहीं किया गया हो, किंतु यदि कोई विधेयक राज्यसभा में लंबित है और लोकसभा द्वारा उसे पारित किए जाने के बाद लोकसभा विघटित हो जाती है, तो वह विधेयक व्यपगत हो जाता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान केवल साधारण विधियों और वित्तीय विधेयकों (धन विधेयक को छोड़कर) के मामलों में गतिरोध को दूर करने के लिए है, तथा संविधान संशोधन विधेयकों के संदर्भ में संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
3. राज्यसभा को लोकसभा की तुलना में यह विशेष संवैधानिक विशेषाधिकार प्राप्त है कि वह अनुच्छेद 312 के तहत अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से एक संकल्प पारित कर सकती है, जिसके आधार पर संसद कानून बना सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के प्रावधानों और भारतीय संघवाद की प्रकृति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को 'राज्यों का संघ' (Union of States) कहा गया है, न कि 'राज्यों का फेडरेशन' (Federation of States), क्योंकि यह संघ राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है और न ही किसी राज्य को संघ से अलग होने (Secession) का कोई अधिकार प्राप्त है।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद को किसी भी राज्य के क्षेत्र को बढ़ाने, घटाने, नाम या सीमा में परिवर्तन करने की शक्ति प्राप्त है, और इस प्रकार का कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है, साथ ही राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य है कि वह संबंधित राज्य के विधानमंडल की राय जानने के लिए विधेयक को उसके पास भेजे और राज्य द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए संवैधानिक रूप से बाध्यकारी है।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'बेरूबारी यूनियन वाद (1960)' में यह स्पष्ट किया गया था कि भारतीय भू-भाग के किसी हिस्से को किसी अन्य देश को सौंपने (Cede) के लिए अनुच्छेद 3 के तहत साधारण बहुमत से संसद में कानून बनाना पर्याप्त है, और इसके लिए किसी संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, राजभाषा और राजनैतिक दलों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें बाद में विभिन्न संवैधानिक संशोधनों (जैसे 21वें, 71वें और 92वें संशोधन) के माध्यम से बढ़ाकर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, किंतु इस अनुसूची में 'अंग्रेज़ी' और 'राजस्थानी' भाषाओं को अभी तक आधिकारिक रूप से शामिल नहीं किया गया है।
2. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की राजभाषा से संबंधित उपबंध किए गए हैं, जिसके तहत अनुच्छेद 351 में यह निर्देश दिया गया है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसके रूप में मुख्य रूप से संस्कृत के साथ-साथ देश की अन्य भाषाओं की शब्दावली को भी आत्मसात करे।
3. वर्ष 1985 के 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसके तहत दलबदल के आधार पर संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की निर्हता (Disqualification) से संबंधित उपबंध किए गए हैं, और इस अनुसूची के अंतर्गत दलबदल से जुड़े किसी विवाद पर अंतिम निर्णय लेने की शक्ति संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (सभापति या अध्यक्ष) के पास होती है, जिसका न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) किसी भी परिस्थिति में नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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