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Indian Polity
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत 'विधानसभा' और 'विधान परिषद' की शक्तियों, विधाई प्रक्रियाओं तथा उनके आपसी संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 171 के प्रावधानों के अनुसार, किसी राज्य की विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती, और विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर किया जाता है।
- 2. धन विधेयक (Money Bill) के मामले में राज्य की विधान परिषद की स्थिति अत्यंत सीमित होती है; विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक को जब विधान परिषद के पास भेजा जाता है, तो विधान परिषद को उसे बिना किसी संशोधन के अधिकतम 14 दिनों की अवधि के भीतर वापस करना होता है, और यदि वह ऐसा नहीं करती है तो वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में उसे विधानसभा ने पारित किया था।
- 3. साधारण विधेयक (Ordinary Bill) के संबंध में विधान परिषद किसी विधेयक को प्रथम बार में अधिकतम 3 महीने और दूसरी बार में अधिकतम 1 महीने—अर्थात कुल 4 महीने तक ही रोक सकती है, तथा दोनों सदनों के बीच गतिरोध को समाप्त करने के लिए संसद की तरह राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाए जाने का संवैधानिक प्रावधान संविधान में स्पष्ट रूप से किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 171(1) के अनुसार विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या संबंधित राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या की एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती, किंतु न्यूनतम संख्या 40 निर्धारित की गई है। साथ ही, विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है (इसके सदस्य स्थानीय निकायों, स्नातकों, शिक्षकों, और विधानसभा सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं तथा कुछ राज्यपाल द्वारा मनोनीत होते हैं)। कथन 2 पूरी तरह सत्य है; संविधान के अनुच्छेद 198 के तहत धन विधेयक केवल विधानसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है और विधान परिषद इसे न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही इसमें संशोधन कर सकती है, उसे अधिकतम 14 दिनों के भीतर इसे लौटाना होता है। कथन 3 असत्य है क्योंकि साधारण विधेयक के मामले में विधान परिषद अधिकतम 4 महीने तक विधेयक को रोक सकती है (प्रथम बार 3 महीने और द्वितीय बार 1 महीना), किंतु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 197 के तहत राज्य विधानमंडल के सदनों में गतिरोध को सुलझाने के लिए **संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का कोई प्रावधान नहीं है**; राज्य विधानसभा की इच्छा ही अंततः सर्वोपरि होती है। अधिक जानकारी के लिए विजिट करें भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल।
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भारतीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्वतंत्रता, अधिकार क्षेत्र और संविधान की व्याख्या करने की शक्ति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित किया गया विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर (Binding) होता है, किंतु स्वयं उच्चतम न्यायालय अपने पूर्ववर्ती निर्णयों या आदेशों से कानूनी रूप से पूरी तरह बंधा हुआ होता है और वह अपने किसी भी पुराने निर्णय को पलटने या उसमें संशोधन करने की शक्ति नहीं रखता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 145 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को भारत के राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है, बशर्ते कि संविधान के किसी उपबंध के अधीन संसद द्वारा बनाई गई कोई विधि इसके प्रतिकूल न हो।
3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण की संसद में चर्चा पर संविधान के अनुच्छेद 121 के तहत पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है, सिवाय उस स्थिति के जब न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव पर संसद में विचार किया जा रहा हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत 'समानता के अधिकार' (अनुच्छेद 14-18) और 'स्वतंत्रता के अधिकार' (अनुच्छेद 19-22) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 14 के अंतर्गत प्रदत्त 'विधि के समक्ष समता' (Equality before Law) का विचार ब्रिटिश संविधान से लिया गया है और यह एक नकारात्मक संकल्पना है जिसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति के पक्ष में विशेष विशेषाधिकारों का अभाव, जबकि 'विधियों का समान संरक्षण' (Equal protection of the laws) अमेरिकी संविधान से लिया गया है जो एक सकारात्मक संकल्पना है।
2. अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत प्रत्येक नागरिक को कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु राज्य को इस अधिकार पर अनुसूचित जनजातियों के हितों के संरक्षण के लिए या किसी व्यवसाय के लिए आवश्यक तकनीकी योग्यता तय करने हेतु उचित प्रतिबंध लगाने की पूर्ण शक्ति है।
3. आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने पर अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त सभी छह स्वतंत्रताएँ स्वतः निलंबित हो जाती हैं, भले ही वह आपातकाल युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर लगाया गया हो या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IVक के अंतर्गत समाविष्ट 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति (1976) की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में जोड़ा गया था, और ये कर्तव्य मूल रूप से केवल नागरिकों पर लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं।
2. संविधान के अनुच्छेद 51क के तहत वर्तमान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं, जिनमें से 11वें मूल कर्तव्य को 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया था, जो छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच के अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करने का माता-पिता या संरक्षक का कर्तव्य निर्धारित करता है।
3. मूल कर्तव्यों की प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) है, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने मूल कर्तव्यों का पालन नहीं करता है, तो संसद या राज्य विधानमंडल विधि द्वारा इसके उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय के माध्यम से रिट अधिकारिता का प्रयोग कर सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ और उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शक्तियों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद को किसी राज्य के नाम, सीमा या क्षेत्र में परिवर्तन करने की विधाई शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत किसी नए राज्य के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही कोई विधेयक संसद के किसी भी सदन में पुनरस्थापित किया जा सकता है, और ऐसा विधेयक प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति के लिए संबंधित राज्य के विधानमंडल का विचार प्राप्त करना अनिवार्य है, भले ही उस राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त की गई राय संसद पर बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के अनुसार, अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 के अधीन नए राज्यों के प्रवेश या गठन तथा सीमाओं और नामों में परिवर्तन करने के लिए बनाई गई विधियों को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माना जाएगा, जिसके लिए विशेष बहुमत और आधे राज्यों के अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है।
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राष्ट्रपति का त्यागपत्र?
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