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Indian Polity
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भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की संरचना, शक्तियों और चुनावी सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के साथ-साथ राज्यों की पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों का अधीक्षण भी करता है।
- 2. वर्ष 1989 तक निर्वाचन आयोग मुख्य रूप से एक एकल-सदस्यीय (Single-member) निकाय था, किंतु अक्टूबर 1989 में राष्ट्रपति ने पहली बार दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करके इसे बहु-सदस्यीय निकाय बनाया, जिसे बाद में 1993 में वैधानिक रूप से स्थायी बहु-सदस्यीय आयोग बना दिया गया।
- 3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के अनुसार, चुनाव प्रचार का कार्य मतदान समाप्त होने के लिए निर्धारित समय से ठीक 48 घंटे पूर्व समाप्त हो जाता है, जिसके दौरान सार्वजनिक बैठकों या जुलूसों पर प्रतिबंध रहता है, जिसे 'मौन अवधि' (Silence Period) कहा जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का संचालन करता है, जबकि राज्यों की पंचायतों और नगरपालिकाओं (स्थानीय निकायों) के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करने की शक्ति अलग से 'राज्य निर्वाचन आयोग' (State Election Commission) के पास होती है (अनुच्छेद 243K और 243ZA)। कथन 2 सत्य है; मूल रूप से निर्वाचन आयोग 1950 से एक-सदस्यीय था, लेकिन 16 अक्टूबर 1989 को राष्ट्रपति ने दो अन्य आयुक्त नियुक्त किए, और अंततः 1993 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (Conditions of Service) अधिनियम के माध्यम से इसे अनिवार्य रूप से बहु-सदस्यीय बना दिया गया। कथन 3 सत्य है; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत मतदान समाप्त होने के समय से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार समाप्त करना अनिवार्य होता है। भारतीय राजनीति और संविधान से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण विषयों को विस्तार से पढ़ने के लिए विजिट करें भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल।
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राज्यसभा सीटें?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा तथा राज्यसभा की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के प्रावधानों के अनुसार, लोकसभा में लंबित कोई भी साधारण विधेयक (Ordinary Bill) जो राज्यसभा द्वारा पारित नहीं किया गया है, लोकसभा के विघटन पर व्यपगत (Lapse) हो जाता है, किंतु यदि कोई विधेयक राज्यसभा में लंबित है और जिसे लोकसभा ने पारित नहीं किया है, तो वह लोकसभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत बुलाई जाने वाली संसद की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष उसकी अध्यक्षता करता है, तथा दोनों के भी अनुपस्थिति की स्थिति में राज्यसभा के उपसभापति द्वारा इसकी अध्यक्षता की जाती है, क्योंकि राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) कभी भी संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार, जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया जाता है, तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है; राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति दे सकता है या रोक सकता है, किंतु यदि वह धन विधेयक (Money Bill) है, तो राष्ट्रपति न तो उसे अपनी अनुमति रोक सकता है और न ही संसद के पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत शहरी स्थानीय शासन (नगरपालिकाओं) के प्रावधानों और उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम द्वारा संविधान में नया भाग IX-A जोड़ा गया है, जिसमें अनुच्छेद 243P से 243ZG तक के प्रावधान शामिल हैं, तथा बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई है जिसमें नगरपालिकाओं की शक्तियों और उत्तरदायित्वों से संबंधित 18 कार्यकारी विषय दिए गए हैं।
2. नगरपालिकाओं के सभी तीनों स्तरों (नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम) के सभी सदस्यों का चुनाव क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष रूप से होता है, और इस अधिनियम में यह अनिवार्य किया गया है कि प्रत्येक नगरपालिका में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए, तथा महिलाओं के लिए कुल सीटों का कम से कम एक-तिहाई (33%) हिस्सा आरक्षित रहेगा।
3. प्रत्येक नगरपालिका की समयावधि उसकी प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख से पाँच वर्ष की होती है, किंतु यदि किसी नगरपालिका का विघटन छह महीने से कम की शेष अवधि के लिए होता है, तो ऐसी स्थिति में उस रिक्त पद को भरने के लिए नए चुनाव कराना अनिवार्य नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत प्रदत्त नागरिकता के प्रावधानों और नागरिकता संशोधन अधिनियमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त (Termination) हो जाएगी, और यह नियम युद्ध काल या शांति काल दोनों ही परिस्थितियों में समान रूप से प्रभावी होता है।
2. नागरिकता अधिनियम, 1957 (मूल रूप से 1955) के अंतर्गत भारत में जन्म से (By Birth) नागरिकता प्राप्त करने के नियम में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं, जिसके तहत 1 जुलाई 1987 के पश्चात भारत में जन्मे किसी भी व्यक्ति को अब स्वचालित रूप से भारत की नागरिकता प्राप्त हो जाती है, भले ही उसके माता-पिता में से कोई एक उस समय भारत का अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) ही क्यों न हो।
3. संविधान का अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में विधि बनाने की संपूर्ण शक्ति प्रदान करता है, और संसद द्वारा इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) पारित किया गया था, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए छह विशिष्ट अल्पसंख्यकों को लक्षित करता है।
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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा का आधार 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द को प्रतिस्थापित कर 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) किया गया, तथा यह भी प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को केवल मंत्रिमंडल (Cabinet) के लिखित अनुमोदन के पश्चात ही राष्ट्रपति द्वारा जारी किया जा सकता है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा यह उपबंधित किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।
3. अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की अधिकतम अवधि, बिना किसी विशेष अनुमोदन या समीक्षा के, लगातार बढ़ाई जाकर कुल 3 वर्ष तक की जा सकती है, किंतु 44वें संशोधन अधिनियम के पश्चात यह अनिवार्य कर दिया गया कि 1 वर्ष के पश्चात इसे आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि पूरे देश में या संबंधित राज्य के किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो तथा निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित करे कि राज्य में विधानसभा के चुनाव कराना कठिन है।
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