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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की शक्तियों, अधिकारक्षेत्र और न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित किया गया विधि (Law declared by Supreme Court) भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर (Binding) होता है, किंतु स्वयं उच्चतम न्यायालय अपने पूर्ववर्ती निर्णयों या आदेशों से कानूनी रूप से पूरी तरह बंधा होता है और वह किसी भी स्थिति में अपने पुराने निर्णय को पलट नहीं सकता है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसा कोई भी डिक्री या आदेश पारित करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक हो, और संसद द्वारा बनाई गई किसी भी विधि के विपरीत भी ऐसा आदेश संपूर्ण भारत में प्रवृत्त होता है।
- 3. अनुच्छेद 145 के प्रावधानों के अनुसार उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति के अनुमोदन से भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के नियमों सहित न्यायालय की प्रक्रिया और आचरण के विनियमन के लिए नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है, और संवैधानिक मामलों की सुनवाई के लिए न्यूनतम पांच न्यायाधीशों की पीठ (Constitution Bench) का बैठना अनिवार्य किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 141 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय देश के अन्य न्यायालयों पर तो बाध्यकारी होते हैं, किंतु स्वयं उच्चतम न्यायालय अपने पूर्ववर्ती निर्णयों या गलतियों से बंधा नहीं रहता है। वह 'बेंच के सिद्धांत' या 'सुधार के अधिकार' (Doctrine of Overruling) के तहत अपने पुराने निर्णयों की समीक्षा कर सकता है और उन्हें पलट सकता है (जैसे केशवानंद भारती वाद ने गोलकनाथ बाद के निर्णय को पलटा था)। कथन 2 सत्य है; अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को भारत में 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने की अनन्य और व्यापक शक्ति प्राप्त है। कथन 3 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 145 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को नियम बनाने की शक्ति राष्ट्रपति के अनुमोदन से जरूर प्राप्त है, किंतु संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि भारत के संविधान की किसी भी निर्वाचन की व्याख्या या अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली संविधान पीठ में न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या पाँच होनी चाहिए, लेकिन सभी संवैधानिक मामलों में यह केवल इसी तक सीमित नहीं है, और इस कथन में विधिक बारीकियों के कारण यह आंशिक रूप से त्रुटिपूर्ण है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के क्रम में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियमों और उनके विशिष्ट प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया तथा उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, और इसी अधिनियम के अंतर्गत वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों के बीच अंतर किया गया तथा नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का कंपनी के नागरिक, सैन्य और राजस्व संबंधी मामलों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया, जिससे भारत में 'द्वैध शासन' की शुरुआत हुई।
3. चार्टर अधिनियम, 1813 के द्वारा भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया, किंतु चीन के साथ व्यापार और चाय के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार अगले 20 वर्षों के लिए सुरक्षित रखा गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा-राज्यसभा के संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान केवल साधारण विधेयकों और वित्तीय विधेयकों (अनुच्छेद 117) के मामलों में लागू होता है, किंतु यह प्रक्रिया धन विधेयकों (Money Bills) और संविधान संशोधन विधेयकों (Constitutional Amendment Bills) के संबंध में लागू नहीं की जा सकती है।
2. लोकसभा द्वारा पारित और राज्यसभा को भेजे गए किसी साधारण विधेयक को यदि राज्यसभा द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है या राज्यसभा उसमें ऐसे संशोधनों से सहमत नहीं होती है जिन्हें लोकसभा स्वीकार न करे, तो राष्ट्रपति दोनों सदनों के बीच गतिरोध को समाप्त करने के लिए संयुक्त बैठक आहूत कर सकता है, जिसकी अध्यक्षता अनिवार्य रूप से लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) द्वारा की जाती है।
3. लोकसभा का विघटन होने पर राज्यसभा में लंबित ऐसा कोई भी विधेयक जो लोकसभा द्वारा पारित नहीं किया गया हो, व्यपगत (Lapse) हो जाता है, जबकि राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त बैठक बुलाए जाने की अधिसूचना जारी होने के पश्चात् यदि लोकसभा का विघटन हो जाता है, तो भी संयुक्त बैठक आहूत की जाएगी और विधेयक व्यपगत नहीं होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों और उनके संवैधानिक क्रियान्वयन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को क्षमादान की जो शक्ति प्रदान की गई है, उसके तहत मृत्युदंड के मामले में केवल राष्ट्रपति को ही पूर्ण क्षमा (Pardon) देने की अनन्य शक्ति प्राप्त है, और राज्यपाल को राज्य सूची के विषयों पर भी मृत्युदंड के मामले में क्षमादान देने की कोई संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
2. राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण की शक्ति (अनुच्छेद 123) संसद की विधि बनाने की शक्ति के सह-विस्तारित है, और राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश को संसद के पुनः समवेत होने पर दोनों सदनों के समक्ष रखना अनिवार्य होता है, तथा यदि संसद उस अध्यादेश को बिना अनुमोदन के अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित कर देती है, तो वह संसद के पुनः समवेत होने के ठीक छह सप्ताह बाद स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है।
3. 'कीहर सिंह बनाम भारत संघ वाद' और 'शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ वाद' में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 72 के अंतर्गत दया याचिकाओं पर लिए गए निर्णयों की न्यायिक समीक्षा पूरी तरह से वर्जित है और इसके किसी भी आदेश को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
4. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्राप्त है, और यदि विधि या तथ्य का कोई ऐसा सार्वजनिक महत्व का प्रश्न उत्पन्न होता है जिस पर राष्ट्रपति राय मांगता है, तो उच्चतम न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को अपनी राय देना अनिवार्य होता है, तथा राष्ट्रपति उस राय को मानने के लिए भी पूर्णतः बाध्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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राज्यपाल (Governor) की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है?
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत नियुक्त भारत का महान्यायवादी देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है, जिसे अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में audiencia (सुनवाई) का अधिकार प्राप्त है, किंतु महान्यायवादी को निजी कानूनी प्रैक्टिस (Private Practice) करने से पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है क्योंकि वह केंद्र सरकार का एक पूर्णकालिक वेतनभोगी अधिकारी होता है।
2. महान्यायवादी को संसद के दोनों सदनों या उसकी किसी भी समिति में (जिसका उसे सदस्य बनाया जाए) बोलने और भाग लेने का अधिकार प्राप्त है, किंतु अनुच्छेद 88 के अनुसार उसे संसद में मतदान करने का कोई अधिकार नहीं है और न ही उसे संसद सदस्य को मिलने वाले विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 148 के तहत नियुक्त नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) भारत सरकार की संचित निधि के साथ-साथ प्रत्येक राज्य और उस संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि से होने वाले सभी व्ययों की लेखापरीक्षा करता है जहाँ विधानसभा है, और CAG द्वारा तैयार की गई लेखापरीक्षा रिपोर्ट राष्ट्रपति द्वारा संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखवाई जाती है।
4. CAG को उसके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, किंतु अपने पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात सीएजी भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य कार्यालय या लाभ के पद को धारण करने के लिए पूर्णतः अपात्र (Ineligible) होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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