BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
21 views

भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) तथा अध्यादेश जारी करने की शक्ति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में भी पूरी तरह लागू होती है।
  2. 2. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूर्ण रूप से बाहर है, और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार राष्ट्रपति या राज्यपाल इस शक्ति का प्रयोग करते समय अपने स्वविवेक का उपयोग कर सकते हैं, जिसके लिए मंत्रिपरिषद की सलाह की कोई अनिवार्यता नहीं होती है।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जो संसद के सत्र में न होने पर लाई जाती है, और यह अध्यादेश संसद की पुनः बैठक होने के छह सप्ताह की अवधि समाप्त होने पर स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है, बशर्ते इसे उससे पहले संसद द्वारा अनुमोदित न कर लिया जाए।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 72 के अनुसार राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्राप्त है, जिसमें सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामले भी शामिल हैं (जबकि राज्यपाल के पास यह शक्ति नहीं होती)। कथन 2 गलत है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने 'ईश्वर सिंह बनाम द स्टेट ऑफ पंजाब' और 'एपिरागुंती विजय कुमार मामले' सहित कई निर्णयों में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति पूरी तरह से न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है; इसका प्रयोग मनमाने ढंग से या दुर्भावनापूर्ण तरीके से नहीं किया जा सकता, तथा राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह (सहायता और सलाह) के अनुसार ही कार्य करता है। कथन 3 सही है क्योंकि अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश संसद के दोनों सदनों के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद निष्प्रभावी हो जाता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
Share:

Related Questions

→ भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा-राज्यसभा के संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान केवल साधारण विधेयकों और वित्तीय विधेयकों (अनुच्छेद 117) के मामलों में लागू होता है, किंतु यह प्रक्रिया धन विधेयकों (Money Bills) और संविधान संशोधन विधेयकों (Constitutional Amendment Bills) के संबंध में लागू नहीं की जा सकती है। 2. लोकसभा द्वारा पारित और राज्यसभा को भेजे गए किसी साधारण विधेयक को यदि राज्यसभा द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है या राज्यसभा उसमें ऐसे संशोधनों से सहमत नहीं होती है जिन्हें लोकसभा स्वीकार न करे, तो राष्ट्रपति दोनों सदनों के बीच गतिरोध को समाप्त करने के लिए संयुक्त बैठक आहूत कर सकता है, जिसकी अध्यक्षता अनिवार्य रूप से लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) द्वारा की जाती है। 3. लोकसभा का विघटन होने पर राज्यसभा में लंबित ऐसा कोई भी विधेयक जो लोकसभा द्वारा पारित नहीं किया गया हो, व्यपगत (Lapse) हो जाता है, जबकि राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त बैठक बुलाए जाने की अधिसूचना जारी होने के पश्चात् यदि लोकसभा का विघटन हो जाता है, तो भी संयुक्त बैठक आहूत की जाएगी और विधेयक व्यपगत नहीं होगा। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के संरचनात्मक और वित्तीय उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 243B के अनुसार प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाना अनिवार्य है, किंतु जिन राज्यों की जनसंख्या बीस लाख से अधिक नहीं है, वे मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन न करने का विकल्प चुन सकते हैं। 2. 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायतों को स्वायत्त शासन की संस्था के रूप में स्थापित करते हुए संविधान में एक नया भाग IX जोड़ा गया, जिसके अनुच्छेद 243H के अंतर्गत पंचायतों को कर, शुल्क, पथकर और फीस आरोपित करने, वसूलने तथा विनियोजित करने की विधायी शक्ति प्रदान करने का अधिकार राज्य के विधानमंडल को दिया गया है। 3. राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) की सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात् राज्यपाल द्वारा पंचायतों को दिए जाने वाले अनुदानों का निर्धारण किया जाता है, और यह आयोग पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के साथ-साथ केंद्र सरकार द्वारा सीधे पंचायतों को आवंटित किए जाने वाले केंद्रीय करों के हिस्से का भी निर्धारण करता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना के बारे में क्या निर्णय दिया था? → भारतीय संविधान के अंतर्गत 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति (1976) की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान के भाग IV-A में जोड़ा गया था, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं, जिनमें से 11वां कर्तव्य 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया था। 2. ये सभी मूल कर्तव्य प्रकृति से गैर-न्यायोज्य (Non-justiciable) हैं, अर्थात इनके उल्लंघन पर सीधे तौर पर न्यायालय द्वारा कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती है, किंतु संसद को विधि बनाकर इनके कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने या उल्लंघन पर दंडित करने की शक्ति प्राप्त है, जैसा कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम जैसे कानूनों के माध्यम से स्पष्ट होता है। 3. मूल कर्तव्य केवल भारत के नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं, और स्वर्ण सिंह समिति ने मूल रूप से कर अदायगी (Payment of Taxes) को भी एक मूल कर्तव्य बनाए जाने की अनुशंसा की थी जिसे तत्कालीन सरकार ने स्वीकार कर संविधान में शामिल कर लिया था। → अविश्वास प्रस्ताव कहाँ?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.