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Indian Polity
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा तथा राज्यसभा के संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 107 के अनुसार संसद में पुनः स्थापित कोई भी साधारण विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित किए बिना कानून नहीं बन सकता, किंतु यदि लोकसभा का विघटन हो जाता है, तो राज्यसभा में लंबित ऐसा विधेयक जो लोकसभा द्वारा पारित नहीं किया गया है, व्यपगत (Lapse) नहीं होता है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाने की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, और यह प्रावधान साधारण विधेयकों और वित्तीय विधेयकों (अनुच्छेद 117) के मामलों में लागू होता है, किंतु धन विधेयकों (Money Bills) और संविधान संशोधन विधेयकों (Constitutional Amendment Bills) के संबंध में संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है।
- 3. लोकसभा द्वारा पारित और राज्यसभा को भेजे गए किसी धन विधेयक को राज्यसभा द्वारा अधिकतम 21 दिनों की अवधि के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ लोकसभा को वापस लौटाना अनिवार्य होता है, अन्यथा उस अवधि की समाप्ति पर वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 107(4) के अनुसार, लोकसभा में लंबित या लोकसभा द्वारा पारित होकर राज्यसभा में लंबित कोई विधेयक लोकसभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है, किंतु राज्यसभा में लंबित ऐसा विधेयक जो लोकसभा द्वारा पारित नहीं किया गया है (चाहे वह राज्यसभा में ही मूल रूप से पेश किया गया हो या वहीं लंबित हो), लोकसभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति संयुक्त बैठक आहूत कर सकता है जो साधारण और वित्तीय विधेयकों (अनुच्छेद 117 के खंड (1) से भिन्न) पर लागू होती है। धन विधेयक (अनुच्छेद 110) और संविधान संशोधन विधेयक (अनुच्छेद 368) के मामलों में संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती। कथन 3 गलत है: धन विधेयक के मामले में राज्यसभा को विधेयक प्राप्ति की तारीख से अधिकतम 14 दिनों की अवधि के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ लोकसभा को इसे लौटाना होता है, न कि 21 दिनों के भीतर। इस व्यापक और विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था को पढ़ें।
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भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में 'अखिल भारतीय सेवाओं' (All India Services) का प्रावधान है?
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत 'विधानसभा' और 'विधान परिषद' की शक्तियों, विधायी प्रक्रियाओं और विशेषाधिकारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार, यदि विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को अस्वीकार कर देती है या ऐसे संशोधन करती है जिससे विधानसभा असहमत है, या विधान परिषद द्वारा विधेयक प्राप्ति के पश्चात चार महीने तक कोई निर्णय नहीं लिया जाता है, तो विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पारित करके विधान परिषद को पुनः भेज सकती है, जिसके पश्चात विधान परिषद अधिकतम एक महीने की अवधि तक ही उस विधेयक को रोक सकती है।
2. धन विधेयक (Money Bill) के मामले में विधान परिषद की स्थिति अत्यंत सीमित होती है; विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक को जब विधान परिषद के पास भेजा जाता है, तो उसे 14 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ विधानसभा को वापस लौटाना अनिवार्य होता है, और यदि विधान परिषद 14 दिनों के भीतर विधेयक नहीं लौटाती है, तो वह दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित मान लिया जाता है जैसा विधानसभा ने पारित किया था।
3. राज्य विधानमंडल के सदनों की अवधि के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 172 के अनुसार, विधानसभा एक निरंतर चलने वाला निकाय है और इसका विघटन कभी नहीं होता है, जबकि विधान परिषद का प्रत्येक सदस्य 6 वर्ष के लिए चुना जाता है और इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी संबंधों और अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 249 के अंतर्गत यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से कोई संकल्प पारित कर यह घोषित करती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी भी विषय पर विधि बना सकती है, तो ऐसी संसद की विधि अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 263 के प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति द्वारा स्थापित अंतर-राज्यीय परिषद् एक स्थायी संवैधानिक निकाय नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रपति की विवेكधीन शक्ति के अंतर्गत जब कभी आवश्यकता हो, केवल एक विशिष्ट उद्देश्य या विवाद के समाधान के लिए अस्थायी रूप से गठित किया जाता है।
3. सरकारीिया आयोग (Sarkaria Commission) की संस्तुतियों के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा गठित अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थायी संरचना में प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होते हैं, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होते हैं, तथा इसके अलावा प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत केंद्रीय मंत्रिपरिषद के 6 कैबिनेट मंत्री भी इसके स्थायी सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक पदों, अधिकारों और कृत्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महान्यायवादी को भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में audiencia (सुनवाई) का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, किंतु अनुच्छेद 88 के तहत उसे संसद में मत देने का कोई अधिकार नहीं है।
2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) भारत सरकार के खातों से संबंधित अपनी लेखापरीक्षा रिपोर्टें सीधे संसद में प्रस्तुत करता है, जबकि राज्यों के खातों से संबंधित रिपोर्टें वह सीधे राज्य विधानसभा में पेश करता है।
3. सीएजी का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) होता है, और उसे उसके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत प्रदत्त नागरिकता के प्रावधानों और नागरिकता (संशोधन) अधिनियमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर लेता है, तो उसका भारतीय नागरिक होना स्वतः समाप्त हो जाएगा, और यह नियम उन सभी परिस्थितियों में लागू होता है चाहे देश में आपातकाल लागू हो या नहीं।
2. अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में विधि बनाने की पूर्ण शक्ति प्रदान करता है, और इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया था।
3. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अंतर्गत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा और उन्हें देशीयकरण (Naturalisation) द्वारा नागरिकता प्राप्त करने के लिए निर्धारित निवास की अवधि को 11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया है।
4. संविधान का अनुच्छेद 10 यह उपबंध करता है कि प्रत्येक व्यक्ति, जो इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में से किसी के अधीन भारत का नागरिक है या समझा जाता है, संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए भारत का नागरिक बना रहेगा, जिसका अर्थ है कि संसद नागरिकता के अधिकारों को किसी भी स्थिति में विधि बनाकर वापस नहीं ले सकती है।
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