त्वरित लिंक्स
Indian Polity
16 views
भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत शहरी स्थानीय शासन (नगरपालिकाओं) के गठन, संरचना और उनके वित्तीय प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. 74वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया है, जिसमें अनुच्छेद 243P से 243ZG तक के प्रावधान शामिल हैं, तथा इसके तहत बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं के लिए कुल 18 कार्यात्मक विषय (Functional Items) निर्धारित किए गए हैं।
- 2. इस अधिनियम के तहत महानगर योजना समिति (Metropolitan Planning Committee) के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसके सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्य उस महानगर क्षेत्र के भीतर की नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों और जिला पंचायतों के अध्यक्षों में से ही चुने जाने चाहिए।
- 3. राज्य का वित्त आयोग (State Finance Commission) प्रत्येक पांच वर्ष की समाप्ति पर राज्यपाल को यह सिफारिश करता है कि राज्य में नगरपालिकाओं और पंचायतों के बीच करों, शुल्कों और टोल के शुल्कों का वितरण किस प्रकार किया जाए, और राज्य सरकार के लिए इन सिफारिशों को लागू करना पूर्णतः बाध्यकारी होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा भारतीय संविधान में नया भाग IX-A (अनुच्छेद 243P से 243ZG) और बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें नगरपालिकाओं के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 18 विषयों का उल्लेख है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 243ZE के प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक महानगर क्षेत्र के लिए एक महानगर योजना समिति का गठन किया जाता है, जिसके कुल सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य उस क्षेत्र की नगरपालिकाओं के निर्वाचित पार्षदों और जिला पंचायतों के अध्यक्षों में से उस क्षेत्र के व्यक्तियों द्वारा चुने जाते हैं। कथन 3 असत्य है: राज्य वित्त आयोग की सिफारिशें प्रकृति में केवल 'सलाहकार' (Advisory) होती हैं, न कि राज्य सरकार पर पूर्णतः बाध्यकारी। राज्य सरकार के लिए उन सिफारिशों को मानना अनिवार्य नहीं होता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
Related Questions
→
भारतीय संविधान को पूर्ण रूप से कब लागू किया गया था?
→
भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यपालिका और अध्यादेश जारी करने की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की संप्रभुता और शक्ति संसद द्वारा पारित किसी अधिनियम के समान ही होती है, किंतु यह अध्यादेश संसद के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह की अवधि के भीतर स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है, भले ही संसद द्वारा इसे अस्वीकृत करने का कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित न किया गया हो।
2. अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी भी मामले में, जिसमें मृत्युदंड की सजा दी गई हो, क्षमादान, प्रविलंबन, विराम या परिहार की शक्ति प्राप्त है, और इस न्यायिक शक्ति का प्रयोग करते समय राष्ट्रपति के लिए केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह मानना पूरी तरह से संवैधानिक रूप से बाध्यकारी होता है, तथा राष्ट्रपति इस मामले में न्यायालय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूर्णतः मुक्त है।
3. अनुच्छेद 111 के अनुसार जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति दे सकता है या अनुमति रोक सकता है, अथवा धन विधेयक के अतिरिक्त किसी अन्य विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को लौटा सकता है, किंतु यदि संसद उस विधेयक को संशोधनों के साथ या बिना संशोधनों के पुनः पारित कर देती है और राष्ट्रपति के पास भेजती है, तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति देने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय संविधान सभा के गठन और उसकी निर्माण प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव पद्धति (Proportional Representation by means of Single Transferable Vote) के माध्यम से किया गया था, जिसमें ब्रिटिश प्रांतों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में कुल 296 सीटें आवंटित की गई थीं।
2. रियासतें (Princely States) संविधान सभा में सम्मिलित नहीं हुई थीं, क्योंकि रियासतों के शासकों ने कैबिनेट मिशन योजना का पूर्ण रूप से बहिष्कार करने का निर्णय लिया था और सभा के चुनाव में भाग लेने से स्पष्ट मना कर दिया था।
3. संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को आयोजित की गई थी, जिस दिन संविधान सभा ने औपचारिक रूप से 'भारत के संविधान' पर हस्ताक्षर किए और सभा का अस्तित्व समाप्त होने के पश्चात इसे अंतरिम संसद (Provisional Parliament) में परिवर्तित कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
राज्य में 'संवैधानिक तंत्र की विफलता' पर राष्ट्रपति शासन किस अनुच्छेद में है?
→
भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक दायित्वों, वित्तीय नियंत्रण और संसदीय विशेषाधिकारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत नियुक्त भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों और किसी भी संसदीय समिति (जिसका वह सदस्य है) की कार्यवाही में भाग लेने और बोलने का पूर्ण अधिकार है, किंतु उसे संसद के किसी भी सदन में विधिवत मतदान (Voting) करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) न केवल भारत की संचित निधि से किए जाने वाले सभी खर्चों की लेखापरीक्षा करता है, बल्कि वह केंद्र और राज्यों के उन सभी निकायों और निगमों की भी लेखापरीक्षा करता है जिन्हें सरकार द्वारा पर्याप्त वित्तीय अनुदान प्राप्त होता है, तथा CAG द्वारा तैयार की गई सभी लेखापरीक्षा रिपोर्टें सीधे संसद या राज्य विधानसभा में प्रस्तुत की जाती हैं, बिना किसी संवैधानिक प्राधिकारी के पूर्व अवलोकन के।
3. अनुच्छेद 148 के अनुसार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उसके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, तथा सीएजी अपनी पदावधि की समाप्ति के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के लाभ के पद (Office of Profit) या अन्य कार्यालय के पात्र नहीं होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.