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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों (Pardoning Powers) और वीटो शक्तियों (Veto Powers) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामले में तथा उन सभी मामलों में जिनमें दंड या दंडादेश किसी ऐसे विषय के संबंध में है जिस तक संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार होता है, क्षमा, प्रवलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, और इस न्यायिक शक्ति के प्रयोग के लिए राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए पूर्णतः बाध्य है तथा इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में कोई न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
- 2. राष्ट्रपति को किसी विधेयक पर वीटो शक्ति का प्रयोग करते समय संविधान संशोधन विधेयकों के मामले में 'संविधान (चौबीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971' के पश्चात अपनी अनुमति (Assent) देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य कर दिया गया है, अर्थात् राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर अपनी अनुमति रोकने या उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजने की शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है।
- 3. पॉकेट वीटो (Pocket Veto) के मामले में, जिसका प्रयोग राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ेल सिंह द्वारा 1986 में 'भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक' के संदर्भ में किया गया था, संविधान में राष्ट्रपति के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है कि वह संसद द्वारा पारित विधेयक पर कितने समय के भीतर अपनी अनुमति या अस्वीकृति दे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि राष्ट्रपति अनुच्छेद 72 के तहत अपनी क्षमादान शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय (जैसे 'ईश्वर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' या 'एपिरामू वाद') ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है यदि उसका प्रयोग आच्छंदित, मनमाना, भेदभावपूर्ण या mala fide तरीके से किया गया हो। कथन 2 सत्य है, 24वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा यह अनिवार्य कर दिया गया कि संविधान संशोधन विधेयक जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी अनुमति देनी ही होगी (वह वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता)। कथन 3 सत्य है, पॉकेट वीटो के तहत संविधान में राष्ट्रपति के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है, और 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ेल सिंह ने डाकघर संशोधन विधेयक पर इसका प्रयोग किया था। भारतीय राजव्यवस्था के विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर क्लिक करें।
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति किसके नेतृत्व वाली समिति करती है?
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भारत में निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान की गई है, तथा यह एक अखिल भारतीय संस्था है जो केंद्र और राज्य दोनों के लिए समान रूप से निर्वाचन आयोजित करती है।
2. दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने चुनाव सुधारों पर अपनी संस्तुति देते हुए यह सिफारिश की थी कि एक व्यक्ति को दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से लोकसभा या विधानसभा का चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, और इसके साथ ही सरकारी धन या संसाधनों से चुनाव प्रचार पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए।
3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में वर्ष 1996 में किए गए संशोधनों के तहत यह प्रावधान किया गया कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदान की तिथि से ठीक पहले के 48 घंटों की अवधि (जिसे 'साइलेंस पीरियड' कहा जाता है) के दौरान किसी भी प्रकार के सार्वजनिक बैठकों, जुलूसों या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार पर कानूनी रूप से रोक होगी।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(ক) के अंतर्गत राज्य अपनी नीति का इस प्रकार विशिष्ट रूप से संचालन करेगा कि सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का समान अधिकार हो, और भौतिक संसाधनों का स्वामित्व तथा नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो सके।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए निर्देश जोड़े गए, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39), समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (अनुच्छेद 39क), उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43क) तथा पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन तथा वन एवं वन्यजीवों की रक्षा (अनुच्छेद 48क) शामिल हैं।
3. यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मौलिक प्रकृति के हैं और देश के कानून बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार इन्हें किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) बनाया गया है, अर्थात् इनके उल्लंघन पर सीधे उच्चतम न्यायालय से प्रवर्तन कराया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की शक्तियों, प्रधानमंत्री के संवैधानिक कर्तव्यों तथा मंत्रिपरिषद की रचना और दायित्वों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 67(क) के अनुसार उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपने पद से त्यागपत्र दे सकता है, किंतु उसका पद से हटाया जाना तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक कि राज्यसभा द्वारा इस आशय का संकल्प अपने तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित न कर दिया जाए और लोकसभा उससे सहमत न हो जाए।
2. संविधान के अनुच्छेद 75(1-क) के अनुसार मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, और यह प्रावधान मूल संविधान में नहीं था बल्कि इसे 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था।
3. संविधान के अनुच्छेद 78 के अंतर्गत प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन से संबंधित और विधान के प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करे, और यदि राष्ट्रपति ऐसा निर्देश दे, तो किसी ऐसे विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, मंत्रिपरिषद के समक्ष विचार के लिए प्रस्तुत करे।
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उससे संबंधित न्यायिक दृष्टांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूसी क्रांति (1917) से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समता और बंधुता' के आदर्शों को अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से ग्रहण किया गया है।
2. 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत इसमें संशोधन कर सकती है, बशर्ते मूल ढांचे का उल्लंघन न हो।
3. 'गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य' (1967) और 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य' (1973) के बीच के न्यायिक सफर में प्रस्तावना की स्थिति को स्पष्ट करते हुए अंततः यह स्थापित किया गया कि प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्ति का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबंध लगाती है, तथा यह गैर-न्यायोज्य (Non-justiciable) है।
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