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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग IV के अंतर्गत उल्लिखित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) की न्यायसंगतता, प्रवर्तनीयता और विभिन्न अनुच्छेदों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित किया गया है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और यह राज्य का कर्तव्य होगा कि वह इन तत्वों को कानून बनाने में लागू करे, किंतु ये किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Non-justiciable) हैं, अर्थात् इन्हें किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के क्रियान्वयन के लिए बनाई गई विधियों को अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जा सकता, और यह सुरक्षात्मक प्रावधान मूल संविधान में ही अंतर्निहित था जिसे किसी भी संविधान संशोधन द्वारा नहीं जोड़ा गया था।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 48A के अनुसार राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन तथा वन और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा, और इस निर्देशक तत्व को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, लेकिन ये किसी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Non-justiciable) नहीं हैं। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 31C (जिसे 25वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा जोड़ा गया था) के अनुसार, अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को प्रभाव देने वाली विधियों को अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के उल्लंघन के आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता। यह प्रावधान मूल संविधान में नहीं था। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 48A (पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की सुरक्षा) को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा भाग IV में जोड़ा गया था। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था का अध्ययन करें।
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संसद का अधिवेशन कौन आहूत (Summon) करता है?
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ब्रिटिश भारत में संवैधानिक विकास के प्रारंभिक चरणों के अंतर्गत वर्ष 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट और वर्ष 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के माध्यम से बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, तथा इसी अधिनियम के तहत कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई थी जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
2. 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पहली बार पृथक किया गया, जिसके तहत राजनीतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) की स्थापना की गई, जबकि व्यापारिक मामलों के अधीक्षण के लिए 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' (Court of Directors) को बरकरार रखा गया।
3. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के माध्यम से ही भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्रों को पहली बार 'ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र के अधीन भारतीय क्षेत्र' (British Possessions in India) कहा गया, और गवर्नर-जनरल की परिषद की संख्या चार से घटाकर तीन कर दी गई ताकि उसे निर्णय लेने में अधिक आसानी हो सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी संबंधों और अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि किसी समय लोक हित में यह प्रतीत हो कि ऐसी परिषद की स्थापना से जनहित साधित होगा, तो वह अंतर-राज्यीय परिषद की स्थापना कर सकता है और इस परिषद का मुख्य कार्य राज्यों के बीच विवादों की जांच करना और उन पर सलाह देना है, जिसमें न्यायीय निर्णय (Adjudication) देने की शक्ति भी शामिल है।
2. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission - 1983) ने अपनी संस्तुति में यह सिफारिश की थी कि अनुच्छेद 263 के अंतर्गत स्थापित होने वाली अंतर-राज्यीय परिषद एक स्थायी निकाय (Permanent body) होनी चाहिए और इसका नाम 'अंतर-सरकार परिषद' (Inter-Governmental Council) होना चाहिए।
3. अनुच्छेद 249 के अनुसार, यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या expedient है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए उस विषय पर कानून बना सकती है और ऐसा संकल्प अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवर्तन में रहता है।
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भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 355' के अंतर्गत 'बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्यों की संरक्षा' (Protection of States against external aggression and internal disturbance) के दायित्व के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अनुच्छेद के तहत यह संघ का कर्तव्य है कि वह बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की संरक्षा करे, तथा यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार ही चलाई जा रही है।
2. 'आंतरिक अशांति' शब्द का मूल संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख था, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा बदलकर 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) कर दिया गया था।
3. संघ को यह संवैधानिक दायित्व पूरा करने के लिए केवल राज्य सरकार की पूर्व सहमति से ही उस राज्य में सशस्त्र बलों को तैनात करने की शक्ति प्राप्त है, और वह राज्य की इच्छा के विरुद्ध ऐसा कदम नहीं उठा सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा तथा राज्यसभा की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के प्रावधानों के अनुसार, लोकसभा में लंबित कोई भी साधारण विधेयक (Ordinary Bill) जो राज्यसभा द्वारा पारित नहीं किया गया है, लोकसभा के विघटन पर व्यपगत (Lapse) हो जाता है, किंतु यदि कोई विधेयक राज्यसभा में लंबित है और जिसे लोकसभा ने पारित नहीं किया है, तो वह लोकसभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत बुलाई जाने वाली संसद की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष उसकी अध्यक्षता करता है, तथा दोनों के भी अनुपस्थिति की स्थिति में राज्यसभा के उपसभापति द्वारा इसकी अध्यक्षता की जाती है, क्योंकि राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) कभी भी संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार, जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया जाता है, तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है; राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति दे सकता है या रोक सकता है, किंतु यदि वह धन विधेयक (Money Bill) है, तो राष्ट्रपति न तो उसे अपनी अनुमति रोक सकता है और न ही संसद के पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकता है।
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