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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यकारी और वीटो शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कोई विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह अपनी अनुमति रोक सकता है (अत्यंतिक वीटो), किंतु यदि संसद उस विधेयक को (धन विधेयक को छोड़कर) संशोधन के बिना या सहित पुनः साधारण बहुमत से पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति के लिए उस पर अपनी अनुमति देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाता है।
- 2. राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश (Ordinance) की शक्ति अनुच्छेद 123 के अंतर्गत उसकी विधायी शक्ति का हिस्सा है, और सर्वोच्च न्यायालय के 'डेको वासुदेव रेड्डी वाद' या अन्य स्थापित निर्णयों के अनुसार, अध्यादेश निर्माण की संतुष्टि न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है और इसे किसी भी न्यायालय में दुर्भावना के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।
- 3. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (अनुच्छेद 72) के अंतर्गत राज्यपाल की तुलना में दो अतिरिक्त शक्तियां प्राप्त हैं - पहली यह कि वह सेना के न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड या डंडादेश को क्षमा कर सकता है, और दूसरी यह कि वह मृत्युदंड (Death Sentence) के मामलों में भी संपूर्ण क्षमादान दे सकता है, जबकि राज्य का राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 111 के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी विधेयक पर अपनी अनुमति रोक सकता है (अत्यंतिक वीटो)। यदि संसद उस विधेयक को पुनर्विचार के पश्चात पुनः पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति उस पर अनुमति देने के लिए बाध्य होता है। कथन 2 गलत है क्योंकि 'एस.आर. बोम्मई वाद' और 'कृष्णा कुमार सिंह वाद' (2017) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा अध्यादेश प्रख्यापित करने की संतुष्टि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आती है, यदि यह स्पष्ट दुर्भावना (mala fide) या संविधान के साथ धोखाधड़ी पर आधारित हो। कथन 3 सही है क्योंकि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72) के पास सेना न्यायालय द्वारा दिए गए दंड और मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान देने की अनन्य शक्ति है, जो राज्य के राज्यपाल के पास (अनुच्छेद 161 के तहत) नहीं होती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies) किस अनुच्छेद में है?
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भारत के राष्ट्रपति की विधाई, कूटनीतिक और आपातकालीन शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 85 के अंतर्गत राष्ट्रपति को लोकसभा को विघटित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति उसकी ऐसी कार्यपालिका शक्ति है जिसके प्रयोग के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सलाह मानना राष्ट्रपति के लिए पूर्ण रूप से बाध्यकारी होता है, भले ही मंत्रिपरिषद ने लोकसभा में बहुमत खो दिया हो या न खोया हो।
2. भारत का राष्ट्रपति किसी भी देश के साथ अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों पर हस्ताक्षर करने और उन्हें स्वीकार करने के लिए पूर्णतः अधिकृत होता है, किंतु ऐसी सभी अंतरराष्ट्रीय संधियाँ और समझौते स्वतः ही भारत के घरेलू कानून बन जाते हैं और उनके क्रियान्वयन के लिए संसद द्वारा किसी भी विधि का निर्माण करना आवश्यक नहीं होता है।
3. राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) की उद्घोषणा के समय राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित करने के लिए आदेश जारी कर सकता है, किंतु अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित करने का ऐसा कोई भी आदेश राष्ट्रपति द्वारा कभी भी जारी नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के निर्वाचन आयोग और चुनाव सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान है, तथा मूल संविधान में यह व्यवस्था थी कि निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय होगा जिसे वर्ष 1950 में ही लागू कर दिया गया था।
2. दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने चुनाव सुधारों पर अपनी संस्तुति देते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के लिए एक कॉलेजियम प्रणाली (जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों) की सिफारिश की थी, साथ ही सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने के उपाय सुझाए थे।
3. निर्वाचन आयोग के किसी भी निर्णय के विरुद्ध, यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच मतभेद उत्पन्न हो जाता है, तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास कोई वीटो पावर नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate Courts) की शक्तियों, अधिकारक्षेत्र और उनकी संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत किसी उच्च न्यायालय की रिट (Writ) अधिकारिता, उच्चतम न्यायालय की अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्राप्त रिट अधिकारिता की तुलना में अधिक विस्तृत है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य विधिक अधिकार (Legal Right) के प्रवर्तन के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के प्रावधानों के अनुसार, किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है, और जिला न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायिक सेवा के व्यक्तियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात नियमों के अनुसार की जाती है।
3. अनुच्छेद 235 के अंतर्गत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण (जिसमें जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों की पोस्टिंग, प्रमोशन और छुट्टी से संबंधित नियंत्रण शामिल है) पूरी तरह से संबंधित राज्य सरकार के गृह विभाग में निहित होता है, और इसमें उच्च न्यायालय की कोई भूमिका नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक दायित्वों, विशेषाधिकारों और उनके कार्यालयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत नियुक्त महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में audiencia (सुनवाई) का अधिकार प्राप्त है, और उसे संसद के दोनों सदनों या उसकी किसी भी समिति की बैठकों में बोलने तथा भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे संसद के सदनों में मतदान का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
2. भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा केंद्र और राज्यों के लेखों से संबंधित प्रतिवेदनों (Reports) को राष्ट्रपति द्वारा संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाया जाता है, और CAG संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है।
3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) अपने पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् भारत सरकार या किसी भी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के अन्य पद या नियोजन का पात्र नहीं होता है, जबकि महान्यायवादी के लिए निजी विधिक प्रैक्टिस करने पर संविधान द्वारा कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, बशर्ते वह सरकार के विरुद्ध किसी मामले में परामर्श न दे।
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