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Indian Polity
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भारतीय संविधान के चतुर्थ भाग के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए यदि संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा कोई विधि बनाई जाती है और वह विधि अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे इस आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जाएगा कि वह उक्त मूल अधिकारों का असंगत है (अनुच्छेद 31C)।
- 2. अनुच्छेद 44 के तहत राज्य पूरे भारत के राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह सिद्धांत प्रकृति से न्यायोचित (Justiciable) है, जिसका अर्थ है कि इसे लागू कराने के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की जा सकती है।
- 3. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए निर्देश जोड़े गए, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39), समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (अनुच्छेद 39A), तथा उद्योगों के प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी (अनुच्छेद 43A) शामिल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: मूल संविधान में अनुच्छेद 31C को 25वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा जोड़ा गया था, जिसके अनुसार यदि राज्य अनुच्छेद 39(b) और (c) में वर्णित सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कानून बनाता है, तो उसे अनुच्छेद 14 और 19 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) संविधान के भाग IV (DPSP) के अंतर्गत आता है जो कि वाद-योग्य (Non-justiciable) नहीं है, अर्थात इसे न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है। कथन 3 सही है: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 39(f), अनुच्छेद 39A, अनुच्छेद 43A और अनुच्छेद 48A जैसे महत्वपूर्ण नीति निर्देशक तत्वों को संविधान में जोड़ा गया था। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।
Related Questions
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के प्रावधानों और नए राज्यों के निर्माण की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को किसी राज्य में से उसका क्षेत्र अलग करके अथवा किसी राज्य के क्षेत्रफल या उसकी सीमा में परिवर्तन करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु इस प्रकार का कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित नहीं किया जा सकता है, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल को उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय संसद पर बाध्यकारी न हो।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत राज्य के नाम या सीमा में परिवर्तन करने वाले विधेयक पर राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित समयावधि के भीतर यदि अपनी राय व्यक्त नहीं की जाती है, तो भी संसद उस विधेयक को पारित करने के लिए आगे बढ़ सकती है, क्योंकि राज्य विधानमंडल की सहमति इस प्रक्रिया के लिए एक अनिवार्य शर्त नहीं है।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार, अनुच्छेद 2 (नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना) और अनुच्छेद 3 (नए राज्यों का निर्माण और क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन) के अंतर्गत बनाए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ आधे से अधिक राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद 'धन विधेयक' (Money Bill) की परिभाषा देता है?
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राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने की शक्ति किस अनुच्छेद में वर्णित है?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) में उल्लिखित शब्दों और उनके ऐतिहासिक तथा वैधानिक संदर्भों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' (Socialist) और 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) शब्दों को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, किंतु ये दोनों शब्द और 'अखंडता' शब्द मूल उद्देश्य प्रस्ताव का हिस्सा नहीं थे, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की विशेष सिफारिश पर शामिल किया गया था।
2. 'प्रस्तावना संविधान का भाग है या नहीं' इस पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का क्रम देखें तो 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अंग मानने से इंकार कर दिया था, जबकि 'केशवानंद भारती वाद' (1973) और 'एलआईसी ऑफ़ इंडिया वाद' (1995) में इसे स्पष्ट रूप से संविधान का एक अभिन्न अंग स्वीकार किया गया।
3. प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality and Fraternity) के आदर्शों को रूसी क्रांति (1917) से प्रेरित होकर अपनाया गया है, जबकि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के आदर्श को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संसद की सबसे बड़ी संसदीय समिति कौन सी है?
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