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Indian Polity
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भारत के निर्वाचन आयोग और चुनाव सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग एक स्थायी और स्वतंत्र निकाय है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अध्यधीन की जाती है, और मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया और आधार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही होते हैं, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की संस्तुति के बिना नहीं हटाया जा सकता।
- 2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 77 के तहत किसी निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा व्यय की जाने वाली अधिकतम सीमा तय करने का अधिकार निर्वाचन आयोग के पास है, और इस अधिनियम के अंतर्गत यदि कोई उम्मीदवार अपने चुनाव खर्च का हिसाब निर्धारित समय के भीतर प्रस्तुत नहीं करता है, तो निर्वाचन आयोग उसे तीन साल की अवधि के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर सकता है।
- 3. वर्ष 1989 के 61वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा मताधिकार की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया, तथा इसी संशोधन के माध्यम से बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग की अवधारणा को हमेशा के लिए अनिवार्य बनाते हुए संविधान के अनुच्छेद 324 में स्थायी रूप से कम से कम तीन चुनाव आयुक्तों का होना法定 रूप से तय किया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया (महाभियोग जैसी प्रक्रिया) के माध्यम से ही हटाया जा सकता है, तथा अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। कथन 2 सही है क्योंकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77 और 10A के प्रावधानों के तहत चुनाव खर्च का हिसाब न देने पर अयोग्यता का प्रावधान है। कथन 3 गलत है क्योंकि 61वें संविधान संशोधन (1989) द्वारा मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष अवश्य की गई थी, किंतु इसके द्वारा अनुच्छेद 324 में बहु-सदस्यीय आयोग को स्थायी रूप से अनिवार्य नहीं किया गया था; राष्ट्रपति समय-समय पर आवश्यकतानुसार अन्य आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत शहरी स्थानीय शासन (नगरपालिकाओं) के गठन, संरचना और उनके वित्तीय प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 74वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया है, जिसमें अनुच्छेद 243P से 243ZG तक के प्रावधान शामिल हैं, तथा इसके तहत बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं के लिए कुल 18 कार्यात्मक विषय (Functional Items) निर्धारित किए गए हैं।
2. इस अधिनियम के तहत महानगर योजना समिति (Metropolitan Planning Committee) के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसके सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्य उस महानगर क्षेत्र के भीतर की नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों और जिला पंचायतों के अध्यक्षों में से ही चुने जाने चाहिए।
3. राज्य का वित्त आयोग (State Finance Commission) प्रत्येक पांच वर्ष की समाप्ति पर राज्यपाल को यह सिफारिश करता है कि राज्य में नगरपालिकाओं और पंचायतों के बीच करों, शुल्कों और टोल के शुल्कों का वितरण किस प्रकार किया जाए, और राज्य सरकार के लिए इन सिफारिशों को लागू करना पूर्णतः बाध्यकारी होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत पारित विभिन्न अधिनियमों और उनके प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, तथा इसी अधिनियम के तहत वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक कर दिया गया; राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) की स्थापना की गई, जबकि वाणिज्यिक मामलों के लिए 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' (Court of Directors) को बनाए रखा गया।
3. चार्टर अधिनियम, 1833 ने बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बना दिया और देश की प्रथम बार विधि निर्माण संबंधी शक्तियों का केंद्रीकरण करते हुए बंबई और मद्रास के गवर्नरों की विधि बनाने की विधायी शक्तियों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राजभाषा के संवैधानिक उपबंधों, राजनीतिक दलों की मान्यता से संबंधित प्रावधानों तथा संविधान की विभिन्न अनुसूचियों और भागों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा से संबंधित उपबंध किए गए हैं, जिसमें अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, तथा मूल संविधान में यह प्रावधान किया गया था कि संविधान लागू होने के पंद्रह वर्ष की अवधि तक (अर्थात 1965 तक) सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग जारी रहेगा, जिसे संसद ने 'राजभाषा अधिनियम, 1963' के माध्यम से अनिश्चित काल के लिए आगे बढ़ा दिया।
2. संविधान की दसवीं अनुसूची (जिसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था) के अंतर्गत दलबदल के आधार पर अयोग्यता के प्रश्नों का निर्धारण करने की अंतिम शक्ति सदन के सभापति या अध्यक्ष को दी गई है, और उच्चतम न्यायालय ने 'किहोटो होलोहन वाद' (1992) में यह स्पष्ट किया था कि पीठासीन अधिकारी (Speaker/Chairman) द्वारा इस संबंध में लिया गया निर्णय पूरी तरह से न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर है और इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें बाद में विभिन्न संशोधनों (जैसे 21वें, 71वें और 92वें संविधान संशोधन) के माध्यम से बढ़ाकर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, और किसी भी राजनीतिक दल को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 'राष्ट्रीय दल' (National Party) के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए यह अनिवार्य है कि वह कम से कम चार अलग-अलग राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे और साथ ही लोकसभा की कम से कम चार सीटें जीते।
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