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Indian Polity
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' को लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे पुनःस्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति आवश्यक होती है, किंतु राज्यसभा इस विधेयक को पारित करने, अस्वीकृत करने या इसमें संशोधन करने (धन विधेयकों की तरह प्रतिबंधों के अधीन रहते हुए) की सामान्य विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकती है।
- 2. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' (जिसमें ऐसा उपबंध है जिससे भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़े) को संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन को उस विधेयक पर विचार करने की संस्तुति न कर दी हो।
- 3. लोकसभा और राज्यसभा के बीच विधाई गतिरोध को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान धन विधेयकों और संविधान संशोधन विधेयकों के अतिरिक्त 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' के मामलों में लागू होता है, किंतु 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' के मामलों में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया के अंतर्गत वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) की दोनों श्रेणियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 117(1) के तहत श्रेणी-I वित्तीय विधेयक केवल लोकसभा में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से पेश किए जाते हैं, लेकिन राज्यसभा इनमें संशोधन या अस्वीकृति की सामान्य शक्ति रखती है (बशर्ते वे धन विधेयक न हों)। कथन 2 सही है क्योंकि अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत श्रेणी-II वित्तीय विधेयकों को किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है, परंतु राष्ट्रपति की संस्तुति के बिना पारित नहीं किया जा सकता। कथन 3 भी सही है क्योंकि श्रेणी-I वित्तीय विधेयक पर गतिरोध होने पर अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है। अधिक जानकारी और संपूर्ण अध्ययन सामग्री के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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टायफाइड और कालरा (हैजा) किसके विशिष्ट उदाहरण हैं?
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भारतीय संविधान के भाग IV-A के अंतर्गत वर्णित मूल कर्तव्यों (Fundamental Duties) के प्रवर्तन, प्रकृति और उनके कानूनी दायरा से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में शामिल किया गया था, लेकिन इस समिति ने नागरिकों के लिए कर अदायगी (payment of taxes) को भी एक मूल कर्तव्य बनाए जाने की संस्तुति की थी, जिसे संवैधानिक संशोधन में स्वीकार नहीं किया गया था।
2. प्रकृति से ये मूल कर्तव्य न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इनके उल्लंघन या अनुपालन न करने पर सीधे उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा कोई कानूनी दंड या रिट जारी नहीं की जा सकती है, जब तक कि संसद ने इनके कार्यान्वयन के लिए कोई विशिष्ट दंडात्मक कानून या अधिनियम न बनाया हो।
3. अनुच्छेद 51A के तहत उल्लिखित 11 मूल कर्तव्यों में से कुछ कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, जबकि पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने से संबंधित कुछ कर्तव्य विदेशी नागरिकों पर भी समान रूप से लागू होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संविधान का कौन सा अनुच्छेद 'ग्राम पंचायतों के संगठन' का निर्देश देता है?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत और 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकृत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार बना, जिसमें मूल रूप से 'संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य' की परिकल्पना की गई थी।
2. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरित होकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के आदर्शों को अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से ग्रहण किया गया है।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में पहली और एकमात्र बार संशोधन किया गया जिसके तहत इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्दों को जोड़ा गया, और सर्वोच्च न्यायालय ने 'केशवानंद भारती वाद' (1973) में यह स्पष्ट किया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है तथा इसमें संशोधन किया जा सकता है बशर्ते इसके मूल ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन न हो।
4. संविधान की प्रस्तावना देश के नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता और समता की गारंटी देती है, किंतु यह स्वयं न्यायालयों में गैर-न्याययोचित (Non-justiciable) है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को किसी न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता और यह विधायिका की शक्तियों पर न तो कोई प्रतिबंध लगाती है और न ही उसे कोई अतिरिक्त शक्ति प्रदान करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संविधान का कौन सा भाग निर्वाचन से है?
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