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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग-IVक के अंतर्गत समाविष्ट 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) और उनके प्रवर्तन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान में मूल कर्तव्यों को शामिल करने की अनुशंसा स्वर्ण सिंह समिति द्वारा की गई थी, जिसने करों का भुगतान (Payment of Taxes) करने को भी एक मूल कर्तव्य के रूप में जोड़ने की सिफारिश की थी, जिसे तत्कालीन सरकार ने स्वीकार नहीं किया था।
  2. 2. अनुच्छेद 51क के तहत प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे तथा उसे अक्षुण्ण रखे, और यह विशिष्ट कर्तव्य संविधान द्वारा केवल भारतीय नागरिकों पर ही नहीं, बल्कि भारत में निवास करने वाले विदेशी नागरिकों पर भी समान रूप से लागू होता है।
  3. 3. न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (1999) ने कुछ मूल कर्तव्यों के कानूनी प्रावधानों और उनके कार्यान्वयन से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे, और यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों की प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) है, अर्थात् इनके उल्लंघन पर सीधे उच्चतम न्यायालय से प्रवर्तन कराया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: सरदार स्वर्ण सिंह समिति (1976) ने आपातकाल के दौरान संविधान में मूल कर्तव्यों को जोड़ने की सिफारिश की थी। इस समिति ने नागरिकों द्वारा करों का भुगतान करने को भी एक मूल कर्तव्य बनाने का सुझाव दिया था, जिसे संसद ने स्वीकार नहीं किया था। कथन 2 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत वर्णित सभी मूल कर्तव्य **केवल भारतीय नागरिकों** पर लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं। कथन 3 गलत है: मूल कर्तव्यों की प्रकृति **गैर-न्यायिक (Non-justiciable)** है, अर्थात् इनके उल्लंघन पर सीधे अदालतों द्वारा इन्हें लागू नहीं कराया जा सकता और न ही इनके प्रवर्तन के लिए सीधे अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की जा सकती है, हालांकि संसद विधि बनाकर इनके उल्लंघन पर दंडित कर सकती है। जे.एस. वर्मा समिति ने इनके कानूनी कार्यान्वयन की बात कही थी, लेकिन इनकी प्रकृति को न्यायोचित नहीं बताया था। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विजिट करें।
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